स्वप्न- नंशन: [ नींद से उठ बैठना ]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृषाकपे) = वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले वृषाकपि ! तू (पुनः) = फिर (एहि) = घर में प्राप्त हो। इधर-उधर भटकने की अपेक्षा तू मन को निरुद्ध करके हृदय में आत्मदर्शन करनेवाला हो । प्रभु कहते हैं कि मैं और तू मिलकर (सुविता) = उत्तम कर्मों को (कल्पयावहै) = करनेवाले हों । जीव प्रभु की शक्ति का माध्यम बनें, जीव के माध्यम से प्रभु शक्ति उत्तम कर्मों को सिद्ध करनेवाली हो। [२] जीव इस दुनिया की चमक में अपने कर्त्तव्य को भूल जाता है और अपने लक्ष्य को वह भूला-सा रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह सो सा गया हो। अब (स्वप्ननंशन:) = इस नींद को समाप्त करनेवाला तू अपने लक्ष्य का स्मरण करता है और (अस्तं एषि) = फिर से घर में आता है। (पुनः) = फिर (पथा) = ठीक मार्ग से चलता हुआ हृदयरूप गृह में प्रभु का दर्शन करता है और अनुभव करता है कि (इन्द्रः) = यह परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (विश्वस्मात् उत्तरः) = सबसे उत्कृष्ट है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस संसार में हमें सोये नहीं रह जाना। जागकर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। प्रभु की शक्ति का माध्यम बनकर सदा उत्तम कर्मों को करना है।