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पुन॒रेहि॑ वृषाकपे सुवि॒ता क॑ल्पयावहै । य ए॒ष स्व॑प्न॒नंश॒नोऽस्त॒मेषि॑ प॒था पुन॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

punar ehi vṛṣākape suvitā kalpayāvahai | ya eṣa svapnanaṁśano stam eṣi pathā punar viśvasmād indra uttaraḥ ||

पद पाठ

पुनः॑ । आ । इ॒हि॒ । वृ॒षा॒क॒पे॒ । सु॒वि॒ता । क॒ल्प॒या॒व॒है॒ । यः । ए॒षः । स्व॒प्न॒ऽनंश॑नः । अस्त॑म् । एषि॑ । प॒था । पुनः॑ । विश्व॑स्मात् । इन्द्रः॑ । उत्ऽत॑रः ॥ १०.८६.२१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:86» मन्त्र:21 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:4» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:21


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषाकपे) हे सूर्य ! (यः-एषः-स्वप्ननंशनः) जो यह तू निद्रानाशक-जगानेवाला (पथा पुनः) मार्ग से फिर (अस्तम्-एषि) घर को प्राप्त होता है (पुनः-एहि) फिर आ (सुविता कल्पयावहै) हम दोनों उत्तरध्रुव इन्द्राणी व्योमकक्षा तेरे लिये अनुकूल कार्यसम्पादन करते हैं ॥२१॥
भावार्थभाषाः - सूर्य उत्तरध्रुव की ओर तथा वसन्तसम्पात की ओर पुनः-पुनः जाया-आया  करता है, इससे उत्तरायण और दक्षिणायन ग्रीष्मकाल और शीतकाल बनता रहता है ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वप्न- नंशन: [ नींद से उठ बैठना ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृषाकपे) = वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले वृषाकपि ! तू (पुनः) = फिर (एहि) = घर में प्राप्त हो। इधर-उधर भटकने की अपेक्षा तू मन को निरुद्ध करके हृदय में आत्मदर्शन करनेवाला हो । प्रभु कहते हैं कि मैं और तू मिलकर (सुविता) = उत्तम कर्मों को (कल्पयावहै) = करनेवाले हों । जीव प्रभु की शक्ति का माध्यम बनें, जीव के माध्यम से प्रभु शक्ति उत्तम कर्मों को सिद्ध करनेवाली हो। [२] जीव इस दुनिया की चमक में अपने कर्त्तव्य को भूल जाता है और अपने लक्ष्य को वह भूला-सा रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह सो सा गया हो। अब (स्वप्ननंशन:) = इस नींद को समाप्त करनेवाला तू अपने लक्ष्य का स्मरण करता है और (अस्तं एषि) = फिर से घर में आता है। (पुनः) = फिर (पथा) = ठीक मार्ग से चलता हुआ हृदयरूप गृह में प्रभु का दर्शन करता है और अनुभव करता है कि (इन्द्रः) = यह परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (विश्वस्मात् उत्तरः) = सबसे उत्कृष्ट है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस संसार में हमें सोये नहीं रह जाना। जागकर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। प्रभु की शक्ति का माध्यम बनकर सदा उत्तम कर्मों को करना है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषाकपे) हे वृषाकपे सूर्य ! (यः-एषः-स्वप्ननंशनः) य एष त्वं (पथा पुनः-अस्तम्-एषि) निद्रानाशकमार्गेण पुनः-गृहं प्राप्नोषि (पुनः-एहि) पुनरागच्छ (सुविता कल्पयावहै) आवामहमिन्द्र उत्तरध्रुवोऽथेन्द्राणि व्योमकक्षा च तुभ्यं सुवितानि सुगतानि कर्माणि सम्पादयावः ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Vrshakapi, come again and both of us would create good things for your peace and comfort in well being. Thus destroying the state of dream and sleep, this lover of showers and breeze, Vrshakapi comes home by the paths of existence and piety again and again. Indra is supreme over all the world.