पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह संसार एक मृगतृष्णा के दृश्य के समान है। (धन्व च) = यह मरुस्थल तो है ही, जैसे मरुस्थल में एक मृग पानी की कल्पना करके प्यास बुझाने के लिये उधर भागता है, परन्तु उस स्थान पर पहुँचने पर वहां पानी को न पाकर रेत को ही पाता है और दूरी पर फिर पानी के दृश्य को देखता है और ऊधर भागता है। इस प्रकार यह मरीचिका उसकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करती चलती है, (यत् कृन्तत्रं च) = यह काटनेवाली तो है ही और फिर (ता) = वे मरीचिका के दृश्य (कतिस्वित्) = कितने ही योजना योजनों तक (वि) = [वि तत] विस्तृत हैं। इन योजनों में भागता-भागता वह मृग जैसे मर जाता है, इसी प्रकार मनुष्य के लिये संसार के विषय (धन्व च) = मरुस्थल के समान हैं (च) = और (यत्) = जो (कृन्तत्रम्) = उसकी शक्तियों को छिन्न करनेवाले हैं और (ता) = ये विषय जीवनयात्रा में न जाने (कति स्वित् योजना) = कितने ही योजन चलते-चलते हैं । अन्त में ये मनुष्य को भ्रान्त करके समाप्त कर देते हैं । [२] हे (वृषाकपे) = शक्तिशाली और वासनाओं को कम्पित करनेवाले जीव ! तू इन विषय-मरीचिकाओं में न उलझकर (नेदीयसः) = अपने अत्यन्त समीप निवास करनेवाले प्रभु के (अस्तम्) = गृह को एहि आ । हृदय ही प्रभु का गृह है विषय व्यावृत्त होकर हम अन्तर्मुख यात्रा करते हुए उस हृदय में स्थित होने के लिये यत्नशील हों । (गृहान् उप) = इन प्रभु गृहों के हम समीप रहनेवाले बनें और यह अनुभव करें कि (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (विश्वस्मात् उत्तर:) = सम्पूर्ण संसार से उत्कृष्ट हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संसार की मरीचिका में कोसों भटकते रहने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि हम हृदयरूप गृह में प्रभु का दर्शन करें ।