सृष्टि निर्माण जीव के लिये
पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु प्रकृति से कहते हैं कि (इन्द्राणि) = हे प्रकृति ! (अहम्) = मैं (सख्युः) = इस मित्र 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया०' (वृषाकपेः) = वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले और अतएव शक्तिशाली इस वृषाकपि के (ऋते) = बिना (न रारणे) = इस सृष्टिरूप क्रीड़ा को नहीं करता हूँ । यह सृष्टिरूप क्रीड़ा इस मित्र जीव के लिये ही तो है । आप्तकाम होने से मुझे इसकी आवश्यकता नहीं, जड़ता के कारण तुझे [ प्रकृति को इसकी जरूरत नहीं । जीव इसमें साधन-सम्पन्न होकर उन्नत होता हुआ मोक्ष तक पहुँचता है । [२] वह जीव (यस्य) = जिसकी (इदम्) = यह (अप्यं हविः) = रेतः कण सम्बन्धी (हवि प्रियम्) = इसे प्रीणित करनेवाली होती है और इसके शरीर को कान्ति प्रदान करती है तथा (देवेषु गच्छति) = सब इन्द्रियरूप देवों में जाती है। रेतः कणों का रक्षण करना ही शरीर में इस 'अप्य हवि' को आहुत करना है । यह हवि शरीर को कान्त बनाती है और सब इन्द्रियों को सशक्त बनाती है। [२] इस (अप्यं हवि) = के द्वारा सब शक्तियों का वर्धन करके यह जीव अनुभव करता है कि (इन्द्र:) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (विश्वस्मात् उत्तरः) = सब से अधिक उत्कृष्ट हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु इस सृष्टि का निर्माण जीव के लिये करते हैं। भोगों में न फँसकर जब यह शक्ति को शरीर में ही सुरक्षित करता है, तो प्रभु को पहचान पाता है।