पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के प्रसंग में ही पति कहता है कि हे पत्नि ! तू (अघोरचक्षुः) = कभी भी आँख में क्रोधवाली न हो और इस प्रकार (अ-पति घ्नी एधि) = पति को न मारनेवाली हो । पत्नी सदा क्रोधी स्वभाव की हो और उसकी आँख से क्रोध ही टपकता रहे तो पति के आयुष्य में बड़ी कमी आ जाती है। संसार संघर्ष से परेशान पति घर में आता है और प्रसन्नवदना पत्नी से स्वागत को प्राप्त करता है तो उसका सारा कष्ट समाप्त हो जाता है। पर यदि पत्नी भी क्रोध में आगबबूला हुई बैठी हो तो फिर पति का कल्याण नहीं। [२] हे पत्नि ! तू घर में (पशुभ्यः शिवा) = गवादि पशुओं के लिये भी शिवा कल्याण करनेवाली हो । (सुमनाः) = सदा उत्तम मनवाली और परिणामतः (सुवर्चा:) = उत्तम वर्चस्वाली हो। मन विलासमय होने पर वर्चस्विता का सम्भव नहीं होता । [३] उत्तम मनवाली व वर्चस्विनी होती हुई तू (वीरसूः) = वीर सन्तानों को जन्म दे । वीर सन्तानों को जन्म वही दे पाती है जिसके कि मन में किसी प्रकार का अशुभ विचार न हो, वासना के अभाव में जो वर्चस्विनी हो । [४] (देवकामा) = वासनाओं से ऊपर उठने के लिये तू सदा उस देव की कामनावाली हो । प्रभु प्राप्ति का विचार मनुष्य को वासनाओं का शिकार होने से बचाता है । (स्योना) = तू सभी के लिये सुख को देनेवाली हो। (नः) = हमारे (द्विपदे) = दो पाँववाले मनुष्यों के लिये तो तू (शं भव) = शान्ति को देनेवाली हो ही, (चतुष्पदे शम्) = गवादि पशुओं के लिये भी शान्ति को देनेवाली हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - पत्नी [क] क्रोधशून्य हो, [ख] उत्तम मनवाली व वर्चस्विनी हो, [ग] वीर सन्तानों को जन्म दे, [घ] प्रभु प्राप्ति की कामनावाली हो, [ङ] सबके लिये शान्ति का कारण बने ।