'भग- अर्यमा - सविता पुरन्धि-देवाः '
पदार्थान्वयभाषाः - [१] पति पत्नी से कहता है कि मैं (सौभगत्वाय) = सौभाग्य के लिये, गृह को सुभग सम्पन्न बनाने के लिये (ते हस्तं गृह्णामि) = तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तेरे साथ मिलकर मेरे द्वारा यह घर सौभाग्यवाला हो। (यथा) = जिससे (मयापत्या) = मुझ पति के साथ इस घर को सौभाग्य सम्पन्न बनाती हुई तू (जरदष्टिः असः) = जरावस्था का व्यापन करनेवाली हो। इस सुभग गृह में उत्तम जीवनवाले हम दीर्घजीवन को प्राप्त करें। [२] (भगः, अर्यमा, सविता, पुरन्धिः, देवा:) = भग, अर्यमा, सविता, पुरन्धि और देवों ने (त्वा) = तुझे (गार्हपत्याय) = गृहपतित्व के लिये, गृह के कार्य को सम्यक् चलाने के लिये (मह्यम्) = मेरे लिये (अदुः) = दिया है। अर्थात् तेरे माता-पिता ने यह देखकर कि—[क] मैं धन को उचित रूप में कमानेवाला हूँ [भगः], [ख] काम-क्रोधादि शत्रुओं का शिकार नहीं होता [अर्यमा], [ग] निर्माणात्मक कार्यों में अभिरुचिवाला हूँ [सविता], [घ] पालक बुद्धि से युक्त हूँ [ पुरन्धि:], [ङ] उत्तम गुणों को अपनाये हुए हूँ [देवाः] । यह सब कुछ देखकर ही उन्होंने तेरे हाथ को मेरे हाथ में दिया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति को ऐश्वर्य कमानेवाला, कामादि को वश में करनेवाला, निर्माणरुचि, पालक बुद्धिवाला व दिव्य गुणों को धारण करनेवाला होना चाहिए।