वांछित मन्त्र चुनें

गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑ ज॒रद॑ष्टि॒र्यथास॑: । भगो॑ अर्य॒मा स॑वि॒ता पुरं॑धि॒र्मह्यं॑ त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gṛbhṇāmi te saubhagatvāya hastam mayā patyā jaradaṣṭir yathāsaḥ | bhago aryamā savitā puraṁdhir mahyaṁ tvādur gārhapatyāya devāḥ ||

पद पाठ

गृ॒भ्णामि॑ । ते॒ । सौ॒भ॒ग॒ऽत्वाय॑ । हस्त॑म् । मया॑ । पत्या॑ । ज॒रत्ऽअ॑ष्टिः । यथा॑ । असः॑ । भगः॑ । अ॒र्य॒मा । स॒वि॒ता । पुर॑म्ऽधिः । मह्य॑म् । त्वा॒ । अ॒दुः॒ । गार्ह॑ऽपत्याय । दे॒वाः ॥ १०.८५.३६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:36 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:36


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते हस्तम्) हे वधू ! तेरे हाथ को (सौभगत्वाय गृभ्णामि) सौभाग्य के लिये मैं पति ग्रहण करता हूँ (मया पत्या) मुझ पति के साथ (यथा जरदष्टिः-असः) जैसे ही तू जरापर्यन्त सुख भोगनेवाली हो (भगः-अर्यमा सविता) ऐश्वर्यवान् परमात्मा, पुरोहित, जनक-तेरा पिता (पुरन्धिः-देवाः) नगरधारक राजकर्मचारी, ये सब देवभूत पूजनीय महानुभाव (गार्हपत्याय) गृहस्थाश्रम के पति होने के लिये (त्वा मह्यम्-अदुः) तुझे मेरे लिये देते हैं ॥३६॥
भावार्थभाषाः - विवाहसम्बन्ध परमात्मा के आदेशानुसार पुरोहित, पिता, नगराधिकारी इनके साक्षित्व में होना चाहिए। पति-पत्नी का सम्बन्ध गृहस्थ में एक दूसरे को जरापर्यन्त पालन के ढंग का होता है ॥३६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'भग- अर्यमा - सविता पुरन्धि-देवाः '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] पति पत्नी से कहता है कि मैं (सौभगत्वाय) = सौभाग्य के लिये, गृह को सुभग सम्पन्न बनाने के लिये (ते हस्तं गृह्णामि) = तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तेरे साथ मिलकर मेरे द्वारा यह घर सौभाग्यवाला हो। (यथा) = जिससे (मयापत्या) = मुझ पति के साथ इस घर को सौभाग्य सम्पन्न बनाती हुई तू (जरदष्टिः असः) = जरावस्था का व्यापन करनेवाली हो। इस सुभग गृह में उत्तम जीवनवाले हम दीर्घजीवन को प्राप्त करें। [२] (भगः, अर्यमा, सविता, पुरन्धिः, देवा:) = भग, अर्यमा, सविता, पुरन्धि और देवों ने (त्वा) = तुझे (गार्हपत्याय) = गृहपतित्व के लिये, गृह के कार्य को सम्यक् चलाने के लिये (मह्यम्) = मेरे लिये (अदुः) = दिया है। अर्थात् तेरे माता-पिता ने यह देखकर कि—[क] मैं धन को उचित रूप में कमानेवाला हूँ [भगः], [ख] काम-क्रोधादि शत्रुओं का शिकार नहीं होता [अर्यमा], [ग] निर्माणात्मक कार्यों में अभिरुचिवाला हूँ [सविता], [घ] पालक बुद्धि से युक्त हूँ [ पुरन्धि:], [ङ] उत्तम गुणों को अपनाये हुए हूँ [देवाः] । यह सब कुछ देखकर ही उन्होंने तेरे हाथ को मेरे हाथ में दिया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति को ऐश्वर्य कमानेवाला, कामादि को वश में करनेवाला, निर्माणरुचि, पालक बुद्धिवाला व दिव्य गुणों को धारण करनेवाला होना चाहिए।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते हस्तं सौभगत्वाय गृभ्णामि) हे वधु ! तव हस्तं सौभाग्यायाहं गृह्णामि (मया पत्या यथा जरदष्टिः-असः) यथा हि मया पत्या त्वं जरापर्यन्तं सुखभोगिनी भवेः (भगः-अर्यमा सविता पुरन्धिः-देवाः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा पुरोहितो जनको नगरधारको राजकर्मचारी देवभूताः (गार्हपत्याय) गृहस्थाश्रमस्य पतिभावाय (त्वा मह्यम्-अदुः) त्वां मह्यं प्रयच्छन्ति ॥३६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I take your hand for the sake of good fortune so that you may live a long full life till old age with me, your husband. Bhaga, lord of glory, Aryama, lord of cosmic order, Savita lord giver of life and light, and Purandhi, divine beneficence, have given you to me for the creation of a happy home and family.