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स॒त्येनोत्त॑भिता॒ भूमि॒: सूर्ये॒णोत्त॑भिता॒ द्यौः । ऋ॒तेना॑दि॒त्यास्ति॑ष्ठन्ति दि॒वि सोमो॒ अधि॑ श्रि॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

satyenottabhitā bhūmiḥ sūryeṇottabhitā dyauḥ | ṛtenādityās tiṣṭhanti divi somo adhi śritaḥ ||

पद पाठ

स॒त्येन॑ । उत्त॑भिता । भूमिः॑ । सूर्ये॑ण । उत्त॑भिता । द्यौः । ऋ॒तेन॑ । आ॒दि॒त्याः । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । दि॒वि । सोमः॑ । अधि॑ । श्रि॒तः ॥ १०.८५.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में सूर्य द्वारा लोकों को प्रकाश देना, चन्द्रमा ओषधियों में रस प्रेरित करता है, नववधू का विवाह, उसका प्रकार, वधू के कर्त्तव्य, गृहस्थ आचार विशेषरूप से हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (भूमिः) पृथिवीरूप में भूभक्ति-भूभागरूप (सत्येन) उसके अन्दर वर्तमान अग्नि द्वारा (उत्तभिता) कठिन-ठोस की गई है, प्रकाशरूप नक्षत्रतारावली (सूर्येण) प्रकाशपिण्ड सूर्य के द्वारा उदीप्त की गई (आदित्याः-ऋतेन-तिष्ठन्ति) आदान शक्तिवाली किरणें या मास सूर्य के द्वारा स्थिर होते हैं (सोमः) सोम्य उत्पादक धर्म (दिवि) सूर्य के आश्रय में (अधिश्रितः) अधिष्ठित है ॥१॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी को ठोस बनानेवाला पृथिवी के अन्दर का अग्नि है, जो पृथिवी के सूक्ष्म अंशों को अपनी और खींच रहा है, द्युलोक-नक्षत्र तारामण्डल को सूर्य चमकाता है, किरणें या मास सूर्य को आश्रित करते हैं और सोम गुणवाला उत्पादन धर्म सूर्य को आश्रय बनाता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सत्य - सूर्य - ऋत-सोम'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'सूर्या सावित्री' कहती है कि (सत्येन) = सत्य से (भूमिः) = यह पृथिवी (उत्तभिता) = थामी गयी है, अर्थात् पृथ्वी सत्य पर ही आश्रित है। संसार असत्य के आधार पर स्थित नहीं हो सकता । विशेषतः घर में पति-पत्नी का परस्पर सत्य व्यवहार ही उनके गृहस्थ जीवन को सुखी बना सकता है। असत्य से वे परस्पर आशंकित मनोवृत्तिवाले होंगे और गृहस्थ के मूलतत्त्व 'प्रेम' को खो बैंठेंगे। [२] (सूर्येण) = सूर्य से (द्यौ:) = द्युलोक (उत्तभिता) = थामा गया है। द्युलोक का द्युलोकत्व इस देदीप्यमान सूर्य के कारण ही है। सूर्य न हो तो द्युलोक भी इस पृथ्वीलोक की तरह ही हो जाएगा वहाँ प्रकाश न होगा। घर में प्रथम स्थान 'सत्य' का था, तो दूसरा स्थान 'ज्ञान' का है। इसके बिना घर का मापक ऊँचा नहीं उठ सकता। ज्ञान के अभाव में मनुष्य 'मनुष्य' ही नहीं रह जाता। उस घर का जीवन पशु तुल्य हो जाता है । [३] (आदित्याः) = अदिति के, अदीना देवमाता के पुत्र, अर्थात् देव (ऋतेन) = ऋत से, regnlerity [नियमितता] व यज्ञ से (तिष्ठन्ति) = आधारवाले होते हैं । जहाँ ऋत होता है, वहाँ घर के व्यक्ति देव बनते हैं। घर का तीसरा सूत्र 'ऋत' है। सब कार्यों को व्यवस्था से करना, ठीक समय व ठीक स्थान पर करना आवश्यक ही है। साथ ही घर में यज्ञों का होना भी उतना ही आवश्यक है । घर के सब व्यक्तियों की मनोवृत्ति यज्ञिय बने, तो घर पनपता है । [४] (सोमः) = सोम [= वीर्य] (दिवि) = ज्ञान में (अधिश्रितः) = आश्रित है, अर्थात् सोम के रक्षण के लिये स्वाध्याय की वृत्ति आवश्यक है। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और इस प्रकार शरीर में ही उपयुक्त होकर व्यर्थ में व्ययित नहीं होता । सोम का रक्षण करनेवाले पति-पत्नी ही उत्तम सन्तानों को जन्म दे पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उत्तम घर वह है जहाँ — [क] सत्य है, [ख] ज्ञान- प्रवणता है [सूर्य, [ग] ऋत का पालन होता है और [घ] सोम का रक्षण होता है ।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते सूर्यः सर्वान् लोकान् प्रकाशयति, चन्द्रमा ओषधिषु रसं प्रेरयति पुनश्च नववध्वा विवाहस्तत्प्रकारस्तत्र च वध्वाः कर्तव्यानि गृहस्थाचारश्चापि विशिष्टतया वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (भूमिः सत्येन-उत्तभिता) पृथिवीरूपे भूभक्तिः खल्वग्निना “अग्निमुपदिशन् वाचेदं सत्यमिति” [जै० १।१३] “कल्माषग्रीवो रक्षिता” कठिनीकृता “उत्तम्भनम्-उत्कृष्टं प्रतिबन्धनम्” (यजु० ४।३६ दयानन्दः) (द्यौः सूर्येण उत्तभिता) प्रकाशात्मिका नक्षत्रतारामयी सृष्टिः सूर्येण प्रकाशपिण्डेव खलूद्द्योतिता (आदित्याः-ऋतेन तिष्ठति) आदानशक्तिमन्तः किरणाः “आदित्याः किरणाः” [अथर्व० १४।१।२ भाष्यभूमिका-दयानन्दः] यद्वा मासाः सूर्येण “ऋतेन सूर्येण” [यजु० १४।११ भाष्यभूमिका दयानन्दः] स्थिरीभवन्ति (सोमः-दिवि-अधिश्रितः) सोमः सोम्य उत्पादकधर्मः सूर्येऽधिष्ठितः ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma (1-5), Surya vivaha (6-16), Devah (17), Somarkau (18), Chandrama (19), Marriage (20-28), Vadhuvasa samsparsha ninda (29-30), Yakshma nashanam dampatyoh (31) Surya Savitri (32-47) Devatah; Savitri Surya Rshi The earth is sustained by the force of its own identity within the truth of divine law, the heaven is sustained by the sun within the same truth of divine law, the Adityas are sustained by Rtam, the natural law of Divinity, and Soma is sustained in the highest heaven of the same law.