पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मन्युः) = ज्ञान (च) = तथा (वरुणः) = ज्ञान के द्वारा सब दुरितों का निवारण करनेवाले प्रभु (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (उभयम्) = ज्ञान व श्रद्धारूप द्विविध धन को, (समाकृतम्) = सम्यक् उत्पन्न किये हुए को तथा (संसृष्टम्) = परस्पर मिले हुए को (दत्ताम्) = दें । प्रभु कृपा से ज्ञान को प्राप्त करते हुए हम अपने जीवनों में ज्ञान व श्रद्धा का समन्वय करके चलें। इन दोनों को उत्पादन हमारे में सम्यक्तया हो और ये हमारे जीवन में संसृष्ट हों, परस्पर मिले हुए हों । 'ठीक ज्ञान' श्रद्धा को पैदा करता है और 'श्रद्धा' ज्ञान को पैदा करती है। [२] इस प्रकार हमारे मस्तिष्क व हृदय के परस्पर संगत हो जाने पर (शत्रवः) = सब काम-क्रोधादि शत्रु (हृदयेषु भियं दधानाः) = अपने हृदयों में भय का धारण करते हुए (पराजितासः) = पराजित हुए हुए (अपनिलयन्ताम्) = कहीं सुदूर निलीन हो जाएँ। हमारे से दूर जा छिपें । हम कामादि से आक्रान्त न हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान के द्वारा प्रभु-दर्शन होने पर हमारे जीवनों में ज्ञान व श्रद्धा के धन का वह समन्वय होता है कि सब कामादि शत्रु सुदूर विनष्ट हो जाते हैं । इस सम्पूर्ण सूक्त में ज्ञान की ही महिमा का उल्लेख है । [१] यह ज्ञान हमें ओजस्वी बनाता है, कामादि शत्रुओं को पराभूत करता है, [२] यह सब कोशों के ऐश्वर्य को देनेवाला हैं, [३] वास्तविक ज्ञान हमें प्रभु के प्रति श्रद्धान्वित करके हमारे जीवनों में ज्ञान व श्रद्धा के समन्वय को करता है, [४] अब अगले सूक्त में इस 'मन्यु तापस' के गृहस्थ में प्रवेश का उल्लेख है । यह ब्रह्मचर्याश्रम में शक्ति का रक्षण करके, सोम [वीर्य] का पान करके 'सोम' शब्द से ही कहलाता है । यह चाहता है कि सूर्य के समान प्रकाशमय हृदयवाली पत्नी ही इसे प्राप्त हो। इसीलिए उसे 'सूर्या' शब्द से स्मरण किया गया है। मानो यह सविता की ही पुत्री है। यह 'सावित्री सूक्त' ही प्रस्तुत सूक्त की ऋषिका है। गृहस्थ में प्रवेश का मुख्य उद्देश्य सन्तान प्राप्ति है। उसके साधनभूत सोम [वीर्य] के वर्णन से ही सूक्त का प्रारम्भ है।