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वि॒जे॒ष॒कृदिन्द्र॑ इवानवब्र॒वो॒३॒॑ऽस्माकं॑ मन्यो अधि॒पा भ॑वे॒ह । प्रि॒यं ते॒ नाम॑ सहुरे गृणीमसि वि॒द्मा तमुत्सं॒ यत॑ आब॒भूथ॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vijeṣakṛd indra ivānavabravo smākam manyo adhipā bhaveha | priyaṁ te nāma sahure gṛṇīmasi vidmā tam utsaṁ yata ābabhūtha ||

पद पाठ

वि॒जे॒ष॒ऽकृत् । इन्द्रः॑ऽइव । अ॒न॒व॒ऽब्र॒वः । अ॒स्माक॑म् । म॒न्यो॒ इति॑ । अ॒धि॒ऽपाः । भ॒व॒ । इ॒ह । प्रि॒यम् । ते॒ । नाम॑ । स॒हु॒रे॒ । गृ॒णी॒म॒सि॒ । वि॒द्म । तम् । उत्स॑म् । यतः॑ । आ॒ऽब॒भूथ॑ ॥ १०.८४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:84» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाव ! (विजेषकृत्) तू विजयकर्ता है (इन्द्रः-इव) विद्युत् के समान है, विद्युत् जैसी शक्ति रखता है (अनवब्रवः) अनुचित न कहनेवाला किन्तु उचित को सुझानेवाला है (इह) यहाँ (अस्माकम्-अधिपाः-भव) हमारा रक्षक हो (सहुरे) हे विरोधियों के बाधक ! (ते प्रियं नाम) तेरे प्रिय नाम को नमनस्थान को (गृणीमसि) प्रशंशित करते हैं (यतः-आबभूथ) जहाँ से तू आविर्भूत होता है, (तम्-उत्सं विद्म) उस स्यन्दनस्थान को हम जानते हैं-स्तुत करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - आत्मप्रभाव विद्युत् जैसी शक्ति रखता है, बाधकों को दबाता है, उचित बात सुझाता है, इसका मूल स्रोत परमात्मा है, वह आत्मदा है, उसकी स्तुति प्रशंसा करनी चाहिए, जिससे कि वह उत्कृष्ट विचार सुझावे ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ज्ञान का उद्गम स्थान' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे ज्ञान ! तू (विजेषकृत्) = विजय को करनेवाला है। तू काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराजित करता है । (इन्द्र इव) = जितेन्द्रिय पुरुष की तरह (अनवब्रवः) = हुंकार द्वारा पराजित करके भगाया नहीं जा सकता। काम-क्रोधादि की हुंकार तुझे उसी प्रकार भयभीत नहीं कर पाती जैसे कि एक जितेन्द्रिय पुरुष को आसुरवृत्तियाँ पराजित नहीं कर पाती । हे (मन्यो) = ज्ञान ! तू (इह) = इस जीवनयज्ञ में (अस्माकम्) = हमारा (अधियाः) = रक्षक (भव) = हो । [२] हे (सहुरे) = शत्रुओं का मर्षण करनेवाले ज्ञान ! हम (ते) = तेरे (प्रियम्) = प्रिय नाम (गृणीमसि) = स्तोत्र का उच्चारण करते हैं, अर्थात् ज्ञान की महिमा को हृदय में अङ्कित करने के लिये उसका स्तवन करते हैं और ज्ञान के महत्त्व को समझते हुए (तं उत्सम्) = उस स्रोत को भी (विद्मा) = जानते हैं (यतः आबभूथ) = जहाँ से कि यह ज्ञान उत्पन्न होता है। गंगा के महत्त्व को माननेवाला जैसे गंगा के उद्गम स्थान गंगोत्री को देखने का प्रयत्न करता है, उसी प्रकार ज्ञानभक्त पुरुष ज्ञान के स्रोत प्रभु को जानने के लिए यत्नशील होता है। इस प्रभु का ज्ञान ही ज्ञान की चरमसीमा है । यहाँ पहुँचने पर सब पापों का ध्वंस हो जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान कामादि का संहार व पराभव करता है, यही हमारा रक्षक है। ज्ञान के स्रोत प्रभु का दर्शन ही ज्ञान की चरमसीमा है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाव ! (विजेषकृत्) त्वं विजयस्य कर्तासि (इन्द्रः-इव) विद्युदिव यतस्त्वं विद्युच्छक्तिमानसि (अनवब्रवः) अनवक्षिप्तवचनः “अनवब्रवः-अनवक्षिप्तवचनः” [निरु० ६।२९] अननुचितवचनो नितान्तोचितवचनो यथार्थविचारवानसि (इह-अस्माकम्-अधिपाः-भव) अत्रास्माकमधीने सन् रक्षको भव (सहुरे) हे सर्वबाधक ! “जसिसहोरुरिन्” [उणा० २।७४] “सह धातोः उरिन् प्रत्ययः” (ते प्रियं नाम गृणीमसि) तव प्रियं नमनस्थानं यस्मिन् त्वं नमसि “य आत्मदाः” तद्गृणीमः-प्रशंसामः (यतः-आबभूथ) यस्मात् त्वमभिभवसि-आविर्भवसि (तम्-उत्सं विद्म) तमुत्स्यन्दनदेशं जानीमः-तं वयं स्तुमः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Uncontradicted, irreproachable victorious like Indra, O Manyu, be our protector and promoter here throughout life. For sure, O spirit of courage, forbearance and victory, we adore you, dear and adorable of all. We know where you arise from, fountain head of the lust for life, inspiration and victory: Dharma and the universal love of life.