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एको॑ बहू॒नाम॑सि मन्यवीळि॒तो विशं॑विशं यु॒धये॒ सं शि॑शाधि । अकृ॑त्तरु॒क्त्वया॑ यु॒जा व॒यं द्यु॒मन्तं॒ घोषं॑ विज॒याय॑ कृण्महे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eko bahūnām asi manyav īḻito viśaṁ-viśaṁ yudhaye saṁ śiśādhi | akṛttaruk tvayā yujā vayaṁ dyumantaṁ ghoṣaṁ vijayāya kṛṇmahe ||

पद पाठ

एकः॑ । ब॒हू॒नाम् । अ॒सि॒ । म॒न्यो॒ इति॑ । ई॒ळि॒तः । विश॑म्ऽविशम् । यु॒धये॑ । सम् । शि॒शा॒धि॒ । अकृ॑त्तऽरुक् । त्वया॑ । यु॒जा । व॒यम् । द्यु॒ऽमन्त॑म् । घोष॑म् । वि॒ऽज॒याय॑ । कृ॒ण्म॒हे॒ ॥ १०.८४.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:84» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाववाले सेनानायक ! (बहूनाम्-एकः-असि) तू बहुत शत्रुओं का भी अकेला अभिभव करनेवाला है (ईडितः) प्रेरित किया हुआ (विशं विशम्) प्रत्येक सैनिक प्रजा को (सं शिशाधि) उत्साहित करता है (अकृत्तरुक्) तू अच्छिन्न तेजवाला है (वयं त्वया युजा) हम तुझे योक्ता-प्रेरक से प्रेरित हुए (विजयाय) विजय के लिए (द्युमन्तं घोषम्) तेजस्वी नाद को (कृण्महे) करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - सेनानायक बहुतेरे शत्रु को अपने वश में करनेवाला हो, प्रत्येक सैनिक को उभारनेवाले ऐसे नायक के साथ विजय प्राप्त किया जा सकता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विजय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मन्यो) = ज्ञान ! (ईडितः) = उपासित हुआ हुआ (एक:) = अकेला ही (बहूनाम्) = काम- क्रोधादि बहुत से शत्रुओं का (असि) = पराभव करने में समर्थ है। वस्तुतः तू (विशंविशम्) = प्रत्येक प्रजा को (युधये) = इन कामादि शत्रुओं से युद्ध के लिए (सं शिशाधि) = सम्यक् तीक्ष्ण करता है। जब तक मनुष्य ज्ञानोपासना में नहीं चलता तब तक वह काम-क्रोध आदि को शत्रु के रूप में पहिचानता ही नहीं, उन्हें जीतने का तो प्रश्न ही नहीं पैदा होता। ज्ञान की आराधना के प्रारम्भ होते ही उसके ज्ञाननेत्र खुलते हैं और वह इन काम-क्रोधादि को शत्रुरूप में देखने लगता है। अब वह इनके साथ युद्ध की तैयारी करता है । [२] यह ज्ञान (अकृत्तरुक्) = अच्छिन्न कान्तिवाला है । हे निरन्तर दीप्तिवाले ज्ञान ! (त्वया युजा) = तुझ साथी के साथ (वयम्) = हम (विजयाय) = विजय के लिये (द्युमन्तं घोषम्) = ज्योतिर्मय स्तोत्रोच्चारणों को (कृण्महे) = करते हैं। जब हमारा स्तवन ज्ञानपूर्वक होता है तो यह स्तवन हमें कामादि पर विजय करने में समर्थ बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान ही हमें कामादि शत्रुओं के उच्छेद के लिये समर्थ करता है। इस विजय के लिये हम ज्ञानपूर्वक स्तवन में प्रवृत्त होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाववन् सेनानायक ! (बहूनाम्-एकः-असि) बहूनां शत्रूणामप्येकोऽभिभवसि (ईडितः विशं विशं संशिशाधि) त्वमध्येषितः सन् प्रजामात्रं प्रत्येकं सैनिकजनमुत्साहयसि (अकृत्तरुक्) त्वमिच्छन्नतेजस्कोऽसि (त्वया युजा वयम्) त्वया योक्त्रा प्रेरयित्रा प्रेरिता वयं (द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्महे) तेजस्विनं नादं विजयाय कुर्मः ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Manyu, you are the one unique among many, invoked and universally adored. Pray instruct, inspire, prepare and perfect every community to fight and win against negativity and adversity. Your lustre unimpaired and unchallengeable, with you as leader and inspirer, let us raise the blazing battle cry and raise the flag of victory flying sky high.