वांछित मन्त्र चुनें

सह॑स्व मन्यो अ॒भिमा॑तिम॒स्मे रु॒जन्मृ॒णन्प्र॑मृ॒णन्प्रेहि॒ शत्रू॑न् । उ॒ग्रं ते॒ पाजो॑ न॒न्वा रु॑रुध्रे व॒शी वशं॑ नयस एकज॒ त्वम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sahasva manyo abhimātim asme rujan mṛṇan pramṛṇan prehi śatrūn | ugraṁ te pājo nanv ā rurudhre vaśī vaśaṁ nayasa ekaja tvam ||

पद पाठ

सह॑स्व । म॒न्यो॒ इति॑ । अ॒भिऽमा॑तिम् । अ॒स्मे इति॑ । रु॒जन् । मृ॒णन् । प्र॒ऽमृ॒णन् । प्र । इ॒हि॒ । शत्रू॑न् । उ॒ग्रम् । ते॒ । पाजः॑ । न॒नु । आ । रु॒रु॒ध्रे॒ । व॒शी । वश॑म् । न॒य॒से॒ । ए॒क॒ऽज॒ । त्वम् ॥ १०.८४.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:84» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाववाले सेनानी ! (अस्मे) हमारे (अभिमातिम्) अभिमानी शत्रु को (सहस्व) दबा (शत्रून्) शत्रुओं को (रुजन् मृणन् प्रमृणन्) पीड़ित करता हुआ, हिंसित करता हुआ और नष्ट करता हुआ (प्र इहि) परास्त कर परे धकेल (ते पाजः-उग्रम्) तेरा बल प्रतापकारी है (ननु-आ रुरुध्रे) अन्य जन क्या उसे रोक सकते हैं, यह सम्भव नहीं है (वशी) तू सब बलों का वश करनेवाला है, (एकज) हे अकेले ही उत्पन्न हुए ! (त्वं वशं नयसे) तू शत्रुओं को वश में लेता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - सेनानायक ऐसा होना चाहिए, जो अभिमानी शत्रु को दबा दे, उसके बल पराक्रम को कोई न रोक सके, किन्तु वह ही शत्रु के बल को तथा शत्रु को अपने वश में लेनेवाला हो ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभिमान नासक 'मन्यु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मन्योः) = ज्ञान ! तू (अस्मे) = हमारे (अभिमातिम्) = अभिमानरूप शत्रु को (सहस्व) = कुचल डाल । (शत्रून्) = इन कामादि शत्रुओं को (रुजन्) = भग्न करते हुए (मृणन्) = कुचलते हुए और (प्रमृणन्) = एकदम मसलते हुए प्रेहि प्रकर्षेण आगे बढ़नेवाला हो। [२] (ते पाज:) = तेरी शक्ति (उग्रम्) = अत्यन्त तेजोमय है। यह (नु) = अब (न आरुरुध्रे) = रोकी नहीं जा सकती। इस शक्ति का पराभव किसी के लिये सम्भव नहीं । [३] (त्वम्) = तू (एकजम्) = अकेला ही वशी सब शत्रुओं से परास्त न होता हुआ वशं नयसे उन सब शत्रुओं को वशीभूत करता है। ज्ञान के होने पर अन्य आवश्यक साधन जुट ही जाते हैं और कामादि शत्रुओं का पराभव उतना कठिन नहीं रह जाता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानोपार्जन करके अभिमान को दूर करें। इस ज्ञान के द्वारा सब शत्रुओं को भस्म कर पायें ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाववन् सेनानीः ! (अस्मे-अभिमातिम्-सहस्व) अस्माकमभिमानिनं शत्रुं बाधस्व (शत्रून् रुजन् मृणन् प्रमृणन्) शत्रून् पीडयन् हिंसन् नाशयन् (प्र इहि) परास्तान् कुरु (ते पाजः-उग्रम्) तव बलं प्रतापकारि (ननु-आ रुरुध्रे) किन्नु खल्वन्ये रुन्धन्ति-इति न सम्भवति (वशी) त्वं बलस्य वशी (एकज) हे एक एव जात ! तस्मादेकजः (त्वं वशं नयसे) शत्रून् वशं नयसि ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O wrath of justice, rectitude and dispensation, arise, challenge our adversaries, breaking, smashing, eliminating the forces of negation. Blazing is your face and courage, none to obstruct and stay your advance. You are the master, all in control, leader of the forces of predominance, sole born of divinity without an equal.