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अ॒भि प्रेहि॑ दक्षिण॒तो भ॑वा॒ मेऽधा॑ वृ॒त्राणि॑ जङ्घनाव॒ भूरि॑ । जु॒होमि॑ ते ध॒रुणं॒ मध्वो॒ अग्र॑मु॒भा उ॑पां॒शु प्र॑थ॒मा पि॑बाव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi prehi dakṣiṇato bhavā me dhā vṛtrāṇi jaṅghanāva bhūri | juhomi te dharuṇam madhvo agram ubhā upāṁśu prathamā pibāva ||

पद पाठ

अ॒भि । प्र । इ॒हि॒ । द॒क्षि॒ण॒तः । भ॒व॒ । मे॒ । अध॑ । वृ॒त्राणि॑ । ज॒ङ्घ॒ना॒व॒ । भूरि॑ । जु॒होमि॑ । ते॒ । ध॒रुण॑म् । मध्वः॑ । अग्र॑म् । उ॒भौ । उ॒प॒ऽअं॒शु । प्र॒थ॒मा । पि॒बा॒व॒ ॥ १०.८३.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:83» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:7 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अभि प्र इहि) हे आत्मप्रभाव या स्वाभिमान ! तू सम्मुख प्राप्त हो (मे-दक्षिणतः-भव) मेरे दक्षिण पार्श्व के समान हो (अध) पुनः (वृत्राणि) आवरकों-बाधकों को (भूरि जङ्घनाव) बहुत नष्ट करें (ते) तेरे लिये (मध्वः धरुणम्) मधु के प्रमुख धारणीय प्रतिष्ठान को (जुहोमि) देता हूँ (उभा प्रथमा) दोनों शरीर में स्थित प्रमुख होते हुए (उपांशु पिबाव) परस्पर समीप होकर जीवनरस का पान करें-आनन्द लें ॥७॥
भावार्थभाषाः - आत्मप्रभाव या स्वाभिमान दक्षिण अङ्ग की भान्ति सहयोगी साथी है, बाधकों को हटाने के लिए समर्थ है, जीवनरस या जीवनतत्त्व का आनन्द बिना आत्मप्रभाव या स्वाभिमान के नहीं होता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान का समादर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अभि प्रेहि) = हे ज्ञान ! तू मुझे आभिमुख्येन प्राप्त हो । (मे) = मेरे (दक्षिणतः भवा) = दक्षिण की ओर तू हो। अर्थात् मैं तेरा आदर करनेवाला बनूँ। जिसको आदर देते हैं, उसे दाहिनी ओर ही बिठाते हैं । (अधा) = अब हम दोनों (वृत्राणि) = वासनारूप वृत्रों को (भूरि) = खूब ही (जंघनाव) = नष्ट करें। [२] (ते) = तेरे उद्देश्य से, तेरी प्राप्ति के लिये ही (धरुणम्) = शरीर की शक्तियों के धारण करनेवाले (मध्वः अग्रम्) = मधुर वस्तुओं के सर्वश्रेष्ठ इस सोम को (जुहोमि) = अपने अन्दर आहुत करता हूँ । सोम के रक्षण से ही बुद्धि तीव्र होकर ज्ञान में वृद्धि होती हैं । हे ज्ञान ! तू और मैं (उभा) = दोनों मिलकर (उपांशु) = चुपचाप, मौनपूर्वक ध्यानावस्था को अपनाकर (प्रथमा पिबाव) = सबसे प्रथम इसका पान करते हैं। इसका पान ही हमारी सब उन्नतियों का मूल है। इसके शरीर में ही व्याप्त करने के लिये 'ज्ञान प्राप्ति व ध्यान' भी साधन बनते हैं। इसके शरीर में व्याप्त होने पर ज्ञान प्राप्ति व हमारी ध्यान की क्षमता बढ़ती है। इस प्रकार ये परस्पर सहायक होते हैं। 'ज्ञान व ध्यान से सोमपान तथा सोमपान से ज्ञान व ध्यान' यह इनका परस्पर भावन चलता है। एवं यह सोमपान हमें मन्त्र के ऋषि 'मन्यु तापस' बनने में सहायक होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम ज्ञान के साथ वृत्रादि शत्रुओं का हनन करें। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये सोम का पान करें, वीर्यरक्षण करें, ब्रह्मचारी हों । सारे सूक्त में ज्ञान की महिमा का वर्णन है । अगला सूक्त भी इसी विषय को कहता है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अभि प्र इहि) हे आत्मप्रभाव ! सम्मुखं प्राप्नुहि (मे-दक्षिणतः-भव) मम दक्षिणपार्श्व इव भव (अध) अनन्तरम् (वृत्राणि-भूरि जङ्घनाव) आवरकाणि बाधकानि खल्वावां भृशं हनाव (ते) तुभ्यं (धरुणं-मध्वः-अग्रं-जुहोमि) मधुनोग्रं प्रमुखं धारणीयं पदम्-प्रतिष्ठाम् “प्रतिष्ठा वै धरुणम्” [श० ७।४।२।५] (उभा प्रथमा उपांशु पिबाव) उभौ प्रथमौ शरीरे स्थितं समीपं परस्परं जीवनरसपानं कुर्व “उपांशोः-उप समीपम् अनिति तस्य” [यजु० ९।३८ दयानन्दः] ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pray come forward and be on my right side in your own place, and together we shall eliminate all darkness and adversities. I offer you the best, foremost and sweetest honeyed homage of the self, and we shall together drink of the joy of victory in closest intimacy.