पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अभि प्रेहि) = हे ज्ञान ! तू मुझे आभिमुख्येन प्राप्त हो । (मे) = मेरे (दक्षिणतः भवा) = दक्षिण की ओर तू हो। अर्थात् मैं तेरा आदर करनेवाला बनूँ। जिसको आदर देते हैं, उसे दाहिनी ओर ही बिठाते हैं । (अधा) = अब हम दोनों (वृत्राणि) = वासनारूप वृत्रों को (भूरि) = खूब ही (जंघनाव) = नष्ट करें। [२] (ते) = तेरे उद्देश्य से, तेरी प्राप्ति के लिये ही (धरुणम्) = शरीर की शक्तियों के धारण करनेवाले (मध्वः अग्रम्) = मधुर वस्तुओं के सर्वश्रेष्ठ इस सोम को (जुहोमि) = अपने अन्दर आहुत करता हूँ । सोम के रक्षण से ही बुद्धि तीव्र होकर ज्ञान में वृद्धि होती हैं । हे ज्ञान ! तू और मैं (उभा) = दोनों मिलकर (उपांशु) = चुपचाप, मौनपूर्वक ध्यानावस्था को अपनाकर (प्रथमा पिबाव) = सबसे प्रथम इसका पान करते हैं। इसका पान ही हमारी सब उन्नतियों का मूल है। इसके शरीर में ही व्याप्त करने के लिये 'ज्ञान प्राप्ति व ध्यान' भी साधन बनते हैं। इसके शरीर में व्याप्त होने पर ज्ञान प्राप्ति व हमारी ध्यान की क्षमता बढ़ती है। इस प्रकार ये परस्पर सहायक होते हैं। 'ज्ञान व ध्यान से सोमपान तथा सोमपान से ज्ञान व ध्यान' यह इनका परस्पर भावन चलता है। एवं यह सोमपान हमें मन्त्र के ऋषि 'मन्यु तापस' बनने में सहायक होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम ज्ञान के साथ वृत्रादि शत्रुओं का हनन करें। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये सोम का पान करें, वीर्यरक्षण करें, ब्रह्मचारी हों । सारे सूक्त में ज्ञान की महिमा का वर्णन है । अगला सूक्त भी इसी विषय को कहता है-