पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मन्यो) = ज्ञान ! (त्वं हि) = तू ही (अभिभूत्योजाः) = शत्रुओं को पराभूत करनेवाले ओजवाला है। तेरे द्वारा कामादि शत्रुओं का पराभव होता है। यह ज्ञान (स्वयम्भूः) = स्वयं होनेवाला है। हृदय के अन्दर प्रभु के द्वारा स्थापित किया गया है। ईर्ष्या-द्वेष आदि के आवरण के कारण हमारा वह ज्ञान आवृत्त-सा हुआ रहता है। यह ज्ञान (भामः) = तेज है। ज्ञान हमें तेजस्वी बनाता है । (अभिमातिषाहः) = अभिमान का यह पराभव करनेवाला है। ज्ञानी पुरुष सदा विनीत होता है, [२] यह ज्ञान (विश्वचर्षणिः) = सर्वद्रष्टा है, अर्थात् यह केवल अपने हित को न देकर सभी के हित का ध्यान करता है। (सहुरि:) = सहनशील होता है। यह ज्ञानी 'तुल्यनिन्दास्तुतिः ' व 'समः मानापमानयोः ' होता हुआ दूसरों से किये गये अपमान से उत्तेजित नहीं हो जाता। (सहावान्) = यह बलवाला होता है। इस बल के कारण ही यह सहनशील होता है। [३] हे ज्ञान ! तू (पृतनासु) = काम-क्रोध आदि के साथ चलनेवाले अध्यात्म-संग्रामों में तू (अस्मासु) = हमारे में (ओजः धेहि) = ओजस्विता का आधान कर । तेरे से ओजस्वी बनकर हम इन अध्यात्म-संग्रामों में कभी पराजित न हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान वह शक्ति है, जिसके द्वारा हम काम-क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव कर पाते हैं।