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अ॒भी॑हि मन्यो त॒वस॒स्तवी॑या॒न्तप॑सा यु॒जा वि ज॑हि॒ शत्रू॑न् । अ॒मि॒त्र॒हा वृ॑त्र॒हा द॑स्यु॒हा च॒ विश्वा॒ वसू॒न्या भ॑रा॒ त्वं न॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhīhi manyo tavasas tavīyān tapasā yujā vi jahi śatrūn | amitrahā vṛtrahā dasyuhā ca viśvā vasūny ā bharā tvaṁ naḥ ||

पद पाठ

अ॒भि । इ॒हि॒ । म॒न्यो॒ इति॑ । त॒वसः॑ । तवी॑यान् । तप॑सा । यु॒जा । वि । ज॒हि॒ । शत्रू॑न् । अ॒मि॒त्र॒ऽहा । वृ॒त्र॒ऽहा । द॒स्यु॒ऽहा । च॒ । विश्वा॑ । वसू॑नि । आ । भ॒र॒ । त्वम् । नः॒ ॥ १०.८३.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:83» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाव ! तू (अभि-इहि) सम्मुख प्राप्त हो (तवसः-तवीयान्) बलवानों से भी बहुत बलवान् है (युजा तपसा) योक्तव्य तप से युक्त हुआ (शत्रून् वि जहि) काम आदि शत्रुओं को विनष्ट कर (अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च) तू विरोधी विचारों का नाशक, पापनाशक और क्षयकारक रोग का नाशक है (त्वं नः) तू हमारे लिये (विश्वा वसूनि) सब बसानेवाले गुणधनों को (आ भर) आभरित कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - आत्मप्रभाव या स्वाभिमान भारी बलवान् है। तप पुरुषार्थ संयम से युक्त होकर काम आदि दोषों को नष्ट करता है, दुर्विचारों-पापभावों रोगों को भी भगाने में समर्थ है, गुणधनों को प्राप्त कराता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शत्रुनाश व वसु प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मन्यो) = ज्ञान ! तू (अभि इहि) = हमारी ओर आनेवाला हो, हमें प्राप्त हो । तू (तवसः तवीयान्) = बलवान् से भी बलवान् है। ज्ञान सर्वाधिक शक्तिवाला है। (तपसा युजा) = हे ज्ञान ! तप रूप साथी के साथ तू (शत्रून् विजहि) = हमारे काम-क्रोधादि शत्रुओं को नष्ट कर दे । तप से ज्ञान उत्पन्न होता है और यह ज्ञान कामादि शत्रुओं का विध्वंस करनेवाला होता है । [२] हे मन्यो ! तू (अमित्रहा) = हमारे शत्रुओं का नाश करनेवाला है, (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को नष्ट करता है। (च) = और तू (दस्युहा) = दास्यव वृत्ति को समाप्त करनेवाला है, हमारे से नाशक वृत्तियों को यह ज्ञान दूर करता है । [३] हे ज्ञान ! (त्वे) = तू (नः) = हमारे लिये (विश्वा वसूनि) = सब निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों को (आभरा) = प्राप्त करानेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान एक प्रबल शक्ति है । यह हमारे सब शत्रुओं को समाप्त करती है और हमें वसुओं को प्राप्त कराती है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्यो) हे आत्मप्रभाव ! त्वं (अभि-इहि) सम्मुखं प्राप्तो भव (तवसः-तवीयान्) बलवतोऽपि बहुबलवान् (तपसा युजा शत्रून् वि जहि) योक्तव्येन तपसा युक्तः कामादिशत्रून् विनाशय (अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च) त्वं विरोधिविचारहन्तो पापहन्ता क्षयकारकरोगहन्ता चासि (त्वं नः) त्वमस्मभ्यं (विश्वा वसूनि आ भर) सर्वाणि वासयोग्यानि गुणधनानि खल्वाभरितानि कुरु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come manyu, stronger than strength itself, one with valour and austerity of discipline, destroy the enemies. Come, saviour of friends and destroyer of adversaries, dispeller of darkness, eliminator of evil and negativity, bear and bring us all wealth, honour and excellence of the world.