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तमिद्गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ आपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मग॑च्छन्त॒ विश्वे॑ । अ॒जस्य॒ नाभा॒वध्येक॒मर्पि॑तं॒ यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam id garbham prathamaṁ dadhra āpo yatra devāḥ samagacchanta viśve | ajasya nābhāv adhy ekam arpitaṁ yasmin viśvāni bhuvanāni tasthuḥ ||

पद पाठ

तम् । इत् । गर्भ॑म् । प्र॒थ॒मम् । द॒ध्रे॒ । आपः॑ । यत्र॑ । दे॒वाः । स॒म्ऽअग॑च्छन्त । विश्वे॑ । अ॒जस्य॑ । नाभौ॑ । अधि॑ । एक॑म् । अर्पि॑तम् । यस्मि॑न् । विश्वा॑नि । भुव॑नानि । त॒स्थुः ॥ १०.८२.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:82» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्-इत्) उस ही (प्रथमं गर्भम्) प्रमुख ग्रहण करनेवाले परमात्मा को (आपः-दध्रेः) व्याप्त परमाणु अपने ऊपर स्वामी रूप में धारण करते हैं (यत्र) जिस परमात्मा में (विश्वे देवाः) सब मुक्तात्माएँ (समगच्छन्त) सङ्गत होते हैं (अजस्य नाभौ अधि) अजन्मा परमात्मा के मध्य में (एकम्-अर्पितम्) एक हुआ जगत् आश्रित है (यस्मिन्) जिस जगत् में (विश्वानि भुवनानि) सब लोक-लोकान्तर (तस्थुः) स्थित हैं-रहते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा में मुक्तात्माएँ आश्रय पाते हैं। जगत् के परमाणु और समस्त जगत् तथा लोक-लोकान्तर सब उसी परमात्मा में आश्रय लेते हैं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वह सूत्रों का सूत्र

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं इत्) = उस आनन्दमय (प्रथमम्) = अनन्त विस्तारवाले प्रभु को ही (आपः) = सब प्रजाएँ (गर्भं दध्रे) = गर्भरूप से धारण करती हैं, (यत्र) = जिस प्रभु में (विश्वे देवा:) = सब देव (समगच्छन्त) = संगत होते हैं। प्रभु सब प्राणियों के हृदयों में हैं और ये सूर्यादि सब देव उस प्रभु में स्थित हैं । हृदयस्थरूपेण सब प्राणियों को प्रभु प्रेरणा दे रहे हैं और अपने में स्थित इन सूर्यादि को दीप्ति प्राप्त करा रहे हैं। [२] (अजस्य) = उस अजन्मा प्रभु के (नाभौ अधि) = बन्धनशक्ति में (एकम्) = वह अद्वितीय सूत्र (अर्पितम्) = अर्पित हुआ हुआ है, (यस्मिन्) = जिस सूत्र में (विश्वानि भुवनानिं तस्थुः) = सारे लोक- लोकान्तर स्थित हैं । वह सूत्र सचमुच अद्वितीय तो है ही जो कि सारे लोकों को मणियों की तरह अपने में पिरोये हुए है। लोक अलग-अलग हैं, परन्तु एक सूत्र में पिरोये जाकर ये एक हार की तरह प्रतीत होते हैं और अपने-अपने स्थान में गतिशील होते हुए इस ब्रह्माण्ड की शोभा का कारण बनते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-सारे लोक प्रभु में इसी प्रकार प्रोत हैं जैसे कि मणिगण सूत्र में प्रोत होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्-इत्-गर्भम्-प्रथमम्-आपः-दध्रेः) तमेव प्रमुखं ग्रहीतारं परमात्मानं व्याप्ताः परमाणवः स्वोपरि स्वामिरूपं धारयन्ति (यत्र विश्वे देवाः समगच्छन्त) यस्मिन् परमात्मनि सर्वे विद्वांसो मुक्ताः सङ्गच्छन्ते (अजस्य नाभौ-अधि-एकम्-अर्पितम्) तस्य जन्मरहितस्य परमात्मनो मध्ये “मध्यं वै नाभिः” [श० १।१।२।२३] समुदितमेकं जगत् समाश्रितमस्ति (यस्मिन् भुवनानि विश्वानि तस्थुः) यस्मिन् जगति सर्वाणि लोकलोकान्तराणि तिष्ठन्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Vishvakarma is the first power and presence which the particles of Prakrti contain as the immanent generator and which also generates, contains and rules the particles as the transcendent presiding power wherein all the divinities converge, abide and realise themselves. All that is, is self-contained in the central generative core of the eternal unborn and undying spirit, and therein abide all the regions of the universe.