पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (दिवा परः) = इस द्युलोक से पर हैं, (एना पृथिव्या परः) = इस पृथिवी से भी पर हैं। द्युलोक व पृथिवीलोक उस प्रभु को अपने में सीमित नहीं कर पाते । ये तो स्वयं उसके एक देश में हैं। [२] वे प्रभु वे हैं (यद्) = जो (देवेभिः) = ज्ञान की ज्योति से दीप्त व्यक्तियों से (परः) = उत्कृष्ट हैं। ज्ञान के दृष्टिकोण से वे प्रभु ज्ञान की पराकाष्ठा होने से देवों के भी देव हैं, सभी को ज्ञान देनेवाले वे ही हैं। वे प्रभु निरतिशय ज्ञानवाले हैं। (असुरैः) = प्राणशक्ति में रमण करनेवाले [असुषु रमन्ते] अत्यन्त शक्तिशाली पुरुषों से भी वे (परः) = पर हैं। वे प्रभु सर्वशक्तिमान् हैं, शक्ति के दृष्टिकोण से भी सभी को लाँघकर वे स्थित हैं। [३] (आप:) = सब प्रजाएँ उसके (स्वित्) = आनन्दमय (प्रथमम्) = [प्रथ विस्तारे] सर्वव्यापक प्रभु को ही (गर्भं दध्रे) = अपने अन्दर धारण करती हैं। सब के अन्दर प्रभु का वास है और उस प्रभु के कारण ही बुद्धि, बल व तेज आदि से वे प्रजाएँ युक्त होती हैं । उस प्रभु को ये प्रजाएँ अपने अन्दर धारण करती हैं, (यत्र) = जिसमें (विश्वे देवाः) = सब सूर्यादि देव (समपश्यन्त) = स्थित हुए हुए देखे जाते हैं । इन सूर्यादि देवों को भी तो ये प्रभु ही देवत्व प्राप्त कराते हैं । एवं सारा चराचर जगत् उस प्रभु के अंश से ही विभूतिमय हो रहा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को ये द्यावापृथिवी सीमित नहीं कर पाते। वे प्रभु ही ज्ञान व शक्ति से सर्वोच्च हैं । सब प्राणियों के गर्भ में हैं, सब देवों को गर्भ में धारण करनेवाले हैं।