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प॒रो दि॒वा प॒र ए॒ना पृ॑थि॒व्या प॒रो दे॒वेभि॒रसु॑रै॒र्यदस्ति॑ । कं स्वि॒द्गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ आपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मप॑श्यन्त॒ विश्वे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

paro divā para enā pṛthivyā paro devebhir asurair yad asti | kaṁ svid garbham prathamaṁ dadhra āpo yatra devāḥ samapaśyanta viśve ||

पद पाठ

प॒रः । दि॒वा । प॒रः । ए॒ना । पृ॒थि॒व्या । प॒रः । दे॒वेभिः॑ । असु॑रैः । यत् । अस्ति॑ । कम् । स्वि॒त् । गर्भ॑म् । प्र॒थ॒मम् । द॒ध्रे॒ । आपः॑ । यत्र॑ । दे॒वाः । स॒म्ऽअप॑श्यन्त । विश्वे॑ ॥ १०.८२.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:82» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवा परः) जो जगत् रचनेवाला परमात्मा द्युलोक से परे वर्तमान है (एना पृथिव्या परः) इस पृथ्वी से परे वर्तमान महान् अथवा फैली हुई सृष्टि से परे ऊपर स्वामी (देवेभिः-असुरैः-परः) विद्वानों से और असुरों से परे-ऊपर स्वामी (यत्-अस्ति) जिससे वह है (कं स्वित्) उस सुखस्वरूप (प्रथमं गर्भं) प्रमुख ग्रहण करनेवाले को (आपः-दध्रे) व्याप्त परमाणु अपने ऊपर स्वामी रूप में धारण करते हैं (यत्र विश्वेदेवाः समपश्यन्त) जिसमें स्थित सारे विद्वान् ध्यानी जन अपने आत्मा को अनुभव करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा द्युलोक, पृथिवीलोक, मोक्ष तथा सारी सृष्टि का स्वामी है, विद्वानों अविद्वानों का भी स्वामी है, व्याप्त परमाणुओं का भी स्वामी है, उसी के आश्रय में जीवन्मुक्त विद्वान् अपने आत्मा को अनुभव करते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्वव्यापक- सर्वाच्छादक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (दिवा परः) = इस द्युलोक से पर हैं, (एना पृथिव्या परः) = इस पृथिवी से भी पर हैं। द्युलोक व पृथिवीलोक उस प्रभु को अपने में सीमित नहीं कर पाते । ये तो स्वयं उसके एक देश में हैं। [२] वे प्रभु वे हैं (यद्) = जो (देवेभिः) = ज्ञान की ज्योति से दीप्त व्यक्तियों से (परः) = उत्कृष्ट हैं। ज्ञान के दृष्टिकोण से वे प्रभु ज्ञान की पराकाष्ठा होने से देवों के भी देव हैं, सभी को ज्ञान देनेवाले वे ही हैं। वे प्रभु निरतिशय ज्ञानवाले हैं। (असुरैः) = प्राणशक्ति में रमण करनेवाले [असुषु रमन्ते] अत्यन्त शक्तिशाली पुरुषों से भी वे (परः) = पर हैं। वे प्रभु सर्वशक्तिमान् हैं, शक्ति के दृष्टिकोण से भी सभी को लाँघकर वे स्थित हैं। [३] (आप:) = सब प्रजाएँ उसके (स्वित्) = आनन्दमय (प्रथमम्) = [प्रथ विस्तारे] सर्वव्यापक प्रभु को ही (गर्भं दध्रे) = अपने अन्दर धारण करती हैं। सब के अन्दर प्रभु का वास है और उस प्रभु के कारण ही बुद्धि, बल व तेज आदि से वे प्रजाएँ युक्त होती हैं । उस प्रभु को ये प्रजाएँ अपने अन्दर धारण करती हैं, (यत्र) = जिसमें (विश्वे देवाः) = सब सूर्यादि देव (समपश्यन्त) = स्थित हुए हुए देखे जाते हैं । इन सूर्यादि देवों को भी तो ये प्रभु ही देवत्व प्राप्त कराते हैं । एवं सारा चराचर जगत् उस प्रभु के अंश से ही विभूतिमय हो रहा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को ये द्यावापृथिवी सीमित नहीं कर पाते। वे प्रभु ही ज्ञान व शक्ति से सर्वोच्च हैं । सब प्राणियों के गर्भ में हैं, सब देवों को गर्भ में धारण करनेवाले हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवा परः) यो जगद्रचयिता परमात्मा द्युलोकात् परः परवर्तमानो महान् “दिवा पञ्चमीस्थाने तृतीया व्यत्ययेन” (एना पृथिव्या परः) एतस्याः पृथिव्याः परे वर्तमानो महान् मोक्षधाम्नः पर उपरि स्वामी प्रथितायाः सृष्टेः पर उपरि स्वामी (देवेभिः-असुरैः-परः) विद्वद्भ्यः-असुरेभ्यश्च परः उपरि स्वामी (यत्-अस्ति) यतोऽस्ति तस्मात् (कं स्वित् प्रथमं-गर्भं-आपः-दध्रे) तं सुखरूपं ग्रहीतारं खल्वापो व्याप्ताः परमाणवो स्वोपरि स्वामिनं धारयन्ति (यत्र विश्वेदेवाः समपश्यन्त) यस्मिन् स्थिताः सर्वे विद्वांसो ध्यायिनो जनाः स्वात्मानमनुभवन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - What is that generative as well as emergent spirit and reality which is beyond the heavens, beyond this earth and this entire universe, beyond the divinities and the energies, beyond and above all that is in existence? What is that presence, that Hiranyagarbha, that golden seed model of the universe which the primeval Prakrti particles contain and which contains and generates those particles themselves, wherein all the divine existences find and realise themselves?