पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते) = वे गतमन्त्र के अनुसार प्रभु को 'संप्रश्न' [आश्रय] जाननेवाले (पूर्वे ऋषय:) = अपना पूरण करनेवाले तत्त्वज्ञानी लोग (द्रविणम्) = धन को (समस्मा) = सबके लिये (आयजन्त) = दान करते हैं [यज=दाने], अर्थात् वे धन का विनियोग केवल अपने लिये न करके सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करते हैं । (न) = और [न=च] (भूना) [ भूम्ना] = अपने इस बाहुल्य के कारण, बहुतों को अपने परिवार में सम्मिलित करने के कारण, (जरितारः) = ये प्रभु के सच्चे स्तोता होते हैं । प्रभु-भक्त कभी अकेला नहीं खाता। यह अपने में सभी को समाविष्ट कर लेता है और सदा यज्ञ करके यज्ञशेष का ही सेवन करता है । [२] ये ऋषि वे होते हैं ये जो (असूर्ते) = अचर व (सूर्ते) = चर (रजसि) -= लोक में (निषत्ते) = निषण्ण-स्थित उस प्रभु में (इमानि भूतानि) = इन सब प्राणियों को (समकृण्वन्) = [think, regard] सोचते हैं। जो प्रभु में स्थित इन प्राणियों को देखते हैं, वे सब के साथ एक बन्धुत्व का अनुभव करते हैं और इस बन्धुत्व के अनुभव करने के कारण वे धन को समाज के लिये देनेवाले होते हैं। इनके लिये अकेले खाने का सम्भव ही नहीं रहता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - तत्त्वद्रष्टा, सब प्राणियों को प्रभु में स्थित देखता हुआ सब को बन्धु समझता है । सो वह सब के साथ बाँट करके खाता है।