पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (नः पिता) = हम सब के रक्षक हैं, (जनिता) = हम सबको जन्म देनेवाले हैं अथवा हम सबकी शक्तियों के विकास का कारण होते हैं, (यः विधाता) = जो विशिष्ट रूप से हमारा धारण करनेवाले हैं, जो (विश्वा) = सब (धामानि) = तेजों को व (भुवनानि) = लोकों को (वेद) = जानते हैं, हमारे कर्मों के अनुसार इन तेजों व लोकों को वे प्रभु हमें प्राप्त कराते हैं । [२] (यः) = जो एक (एव) = अकेले ही (देवाना नामध:) = सब देवों के नाम को धारण करनेवाले हैं, अर्थात् इन सब देवों को देवत्व प्राप्त कराने के कारण इन सब के नामों से मुख्य रूप से प्रभु का ही प्रतिपादन होता है । वे प्रभु ही 'अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, आपः व प्रजापति' हैं। (तं संप्रश्नम्) = उस [ asylum refuge, आश्रयम्] उस शरण को ही (अन्या भुवना) = अन्य सब प्राणी (यन्ति) = जाते हैं । अर्थात् वे प्रभु ही सूर्यादि को दीप्ति प्राप्त कराके 'देव' शब्द से कहलाने योग्य बनाते हैं और प्राणिमात्र की वे प्रभु ही शरण हैं। अचेतन चेतन सभी के रक्षक वे ही हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही हमारे 'पिता, जनिता व विधाता' हैं। सूर्यादि देवों को वे देवत्व प्राप्त कराते हैं, तो सब प्राणियों को शरण देते हैं ।