'विश्वकर्मा-विमना - विहायाः'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र का जितेन्द्रिय पुरुष (विश्वकर्मा) = अपने सब कर्त्तव्यों का पालन करनेवाला होता है, (विमनाः) = यह विशिष्ट मनवाला, अर्थात् उत्कृष्ट चिन्तनवाला होता है, (आद्) = अब, अर्थात् विश्वकर्मा व विमना होता हुआ (विहाया:) = महान् होता है । इसका हृदय विशाल होता है, उदार दिलवाला होता हुआ यह सभी को अपनी में समाविष्ट करता है । (धाता) = यह सबका धारण करनेवाला बनता है, (विधाता) = विशिष्ट रूप से धारण करता है, (उत) = और (परम सन्दृक्) = [look after] सब से अधिक ध्यान करनेवाला होता है। जैसे माता-पिता बच्चे का ध्यान करते हैं, इसी प्रकार यह विश्वकर्मा सभी का ध्यान करने का प्रयत्न करता है । [२] (तेषाम्) = ऊपर वर्णन किये गये लोगों को ही (इष्टानि) = इष्ट लोकों की प्राप्ति होती है। ये (इषा) = उस प्रभु की प्रेरणा से (संमदन्ति) = सम्यक् हर्ष का अनुभव करते हैं। ये (यत्रा) = जहाँ, जिस स्थिति में पहुँचकर (सप्त ऋषीन्) = कानों, नासिका, आँखों व मुख को परे उस पर परमात्मा में ही धारण करते हैं, उस समय ये लोग (एकं आहुः) = उस अद्वितीय प्रभु का ही शंसन करते हैं । चित्तवृत्ति को एकाग्र करके, जितेन्द्रिय बनकर, प्रभु का शंसन करना ही जीवन का परम सौभाग्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम कर्त्तव्यों को करनेवाले, चिन्तनशील व उदार बनकर औरों का भी धारण करनेवाले बनें। जब इन्द्रियवृत्तियों का निरोध करके हम उस प्रभु का शंसन करेंगे तभी इष्ट लोकों को प्राप्त कर पायेंगे।