पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (विश्वकर्मन्) = सृष्टि रूप कर्मवाले प्रभो ! (या) = जो (ते) = आपके (परमाणि धामानि) = उत्कृष्ट तेज हैं, द्युलोक सम्बन्धी तेज हैं, शरीर में मस्तिष्क ही द्युलोक है और इसका तेज 'बुद्धि' है । उन तेजों को हे (स्वधावः) = स्वयं अपना धारण करनेवाले प्रभो ! (सखिभ्यः) = हम सखाओं के लिये (हविषि) = हवि के होने पर, त्यागपूर्वक अदन के होने पर (शिक्षा) = दीजिये । आपकी कृपा से हमारा मस्तिष्क रूप द्युलोक बुद्धि के तेज से चमके । इसे चमकाने के लिये हम सदा हवि का सेवन करनेवाले बनें। [२] इसी प्रकार (या अवमा) = जो आपके तेज इस (अवम) = सब से निचले लोक, पृथ्वीलोक के साथ सम्बद्ध हैं, उन्हें आप हमें दीजिये । शरीर ही पृथ्वीलोक है । इसका धाम 'तेजस्' कहलाता है। प्रभु कृपा से हमारा शरीर तेजस्वी हो। इस तेजस्विता की प्राप्ति के लिये भी हम त्यागपूर्वक अदन करनेवाले बनें। [३] (उत) = और (इमा) = ये (या) = जो (मध्यमा) = आपके मध्यम लोक, अन्तरिक्षलोक सम्बन्धी तेज हैं, उन्हें भी आप हमें प्राप्त कराइये। शरीर में हृदय ही अन्तरिक्ष व मध्यमलोक है। पवित्रता व निर्देषता ही इसकी शक्ति है। हमें हवि का सेवन करने पर यह पवित्रता व निर्देषता भी प्राप्त हो । प्रभु की कृपा से हम मस्तिष्क में बुद्धि के प्रकाशवाले हों, हृदय में निर्मलता व निर्देषतावाले हों और शरीर में तेजस्विता का सम्पादन कर सकें। (४) हे प्रभो ! आप (तन्वं वृधानः) = हमारे शरीरों को विकसित-शक्तिवाला करने के हेतु से स्(वयं यजस्व) हमें स्वयं ही प्राप्त हो जाइये। आपकी प्राप्ति से आपकी सब शक्तियाँ हमें स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगी [यज संगतिकरणे]। आपका हमारे साथ मेल हुआ और आपकी शक्तियाँ हमें प्राप्त हुईं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-त्यागपूर्वक अदन करते हुए हम त्रिलोकी की शक्तियों को प्राप्त करनेवाले बनें ।