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या ते॒ धामा॑नि पर॒माणि॒ याव॒मा या म॑ध्य॒मा वि॑श्वकर्मन्नु॒तेमा । शिक्षा॒ सखि॑भ्यो ह॒विषि॑ स्वधावः स्व॒यं य॑जस्व त॒न्वं॑ वृधा॒नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yā te dhāmāni paramāṇi yāvamā yā madhyamā viśvakarmann utemā | śikṣā sakhibhyo haviṣi svadhāvaḥ svayaṁ yajasva tanvaṁ vṛdhānaḥ ||

पद पाठ

या । ते॒ । धामा॑नि । प॒र॒माणि॑ । या । अ॒व॒मा । या । म॒ध्य॒मा । वि॒श्व॒ऽक॒र्म॒न् । उ॒त । इ॒मा । शिक्ष॑ । सखि॑ऽभ्यः । ह॒विषि॑ । स्व॒धा॒ऽवः॒ । स्व॒यम् । य॒ज॒स्व॒ । त॒न्व॑म् । वृ॒धा॒नः ॥ १०.८१.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:81» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वकर्मन्) हे विश्व के रचनेवाले परमेश्वर ! (ते धामानि) तेरे व्यापने के योग्य मुख्य स्थान (या परमाणि) जो उत्कृष्ट द्युलोकवाले हैं (या मध्यमा) जो मध्यम अन्तरिक्षसम्बन्धी (उत) और (या-अवमानि) जो पृथिवीलोक के अन्तर्गत हैं (इमा) इन सब को (सखिभ्यः शिक्ष) हम समान धर्मवाले चेतन उपासकों के लिए ज्ञानद्वारा प्राप्त करा (स्वधावः) हे अन्न देनेवाले या रस देनेवाले परमात्मन् ! (तन्वं वृधानः) हमारे शरीर के बढ़ानेहेतु (हविषि स्वयं यजस्व) भोग के निमित्त या भोग्य को स्वयं प्रदान कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा तीनों लोकों और वहाँ के समस्त पदार्थों के अन्दर व्यापक है। उन सब का ज्ञान वेद द्वारा देता है। शरीरवृद्धि के लिए अन्न और रस भी प्रदान करता है। वह ऐसा परमात्मा धन्यवाद के योग्य तथा उपासनीय है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'परम अवम व मध्यम' धाम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (विश्वकर्मन्) = सृष्टि रूप कर्मवाले प्रभो ! (या) = जो (ते) = आपके (परमाणि धामानि) = उत्कृष्ट तेज हैं, द्युलोक सम्बन्धी तेज हैं, शरीर में मस्तिष्क ही द्युलोक है और इसका तेज 'बुद्धि' है । उन तेजों को हे (स्वधावः) = स्वयं अपना धारण करनेवाले प्रभो ! (सखिभ्यः) = हम सखाओं के लिये (हविषि) = हवि के होने पर, त्यागपूर्वक अदन के होने पर (शिक्षा) = दीजिये । आपकी कृपा से हमारा मस्तिष्क रूप द्युलोक बुद्धि के तेज से चमके । इसे चमकाने के लिये हम सदा हवि का सेवन करनेवाले बनें। [२] इसी प्रकार (या अवमा) = जो आपके तेज इस (अवम) = सब से निचले लोक, पृथ्वीलोक के साथ सम्बद्ध हैं, उन्हें आप हमें दीजिये । शरीर ही पृथ्वीलोक है । इसका धाम 'तेजस्' कहलाता है। प्रभु कृपा से हमारा शरीर तेजस्वी हो। इस तेजस्विता की प्राप्ति के लिये भी हम त्यागपूर्वक अदन करनेवाले बनें। [३] (उत) = और (इमा) = ये (या) = जो (मध्यमा) = आपके मध्यम लोक, अन्तरिक्षलोक सम्बन्धी तेज हैं, उन्हें भी आप हमें प्राप्त कराइये। शरीर में हृदय ही अन्तरिक्ष व मध्यमलोक है। पवित्रता व निर्देषता ही इसकी शक्ति है। हमें हवि का सेवन करने पर यह पवित्रता व निर्देषता भी प्राप्त हो । प्रभु की कृपा से हम मस्तिष्क में बुद्धि के प्रकाशवाले हों, हृदय में निर्मलता व निर्देषतावाले हों और शरीर में तेजस्विता का सम्पादन कर सकें। (४) हे प्रभो ! आप (तन्वं वृधानः) = हमारे शरीरों को विकसित-शक्तिवाला करने के हेतु से स्(वयं यजस्व) हमें स्वयं ही प्राप्त हो जाइये। आपकी प्राप्ति से आपकी सब शक्तियाँ हमें स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगी [यज संगतिकरणे]। आपका हमारे साथ मेल हुआ और आपकी शक्तियाँ हमें प्राप्त हुईं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-त्यागपूर्वक अदन करते हुए हम त्रिलोकी की शक्तियों को प्राप्त करनेवाले बनें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वकर्मन्) हे विश्वरचयितः परमेश्वर ! (ते धामानि) तव व्याप्तुं योग्यानि मुख्यस्थानानि (या परमाणि) यानि खलूच्चानि द्युलोकगतानि (सा मध्यमा) यानि ह्यन्तरिक्षगतानि (उत) अपि च (या-अवमानि) यानि पृथिवीलोकसमाविष्टानि सन्ति (इमा सखिभ्यः शिक्ष) इमानि खल्वस्मभ्यं समानधर्मिभ्यो ज्ञानवद्भ्यः सूपासकेभ्यो ज्ञानद्वारा प्रयच्छ-अन्तरे स्थापय (स्वधावः) हे अन्नवन् यद्वा रसमय परमात्मन् ! “स्वधा अन्ननाम” [निघ० २।७] “स्वधायै त्वेति रसाय त्वेत्येवैतदाह” [श० ५।४।३।७] (तन्वं वृधानः) अस्मच्छरीरं वर्धयमानो वर्धनहेतो: (हविषि स्वयं यजस्व) अदननिमित्तं यद्वाऽन्नमत्र “व्यत्येयन सप्तमी” स्वयं प्रयच्छ ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Vishvakarman, creator and maker of the universe, whatever the regions, their names and forms which are your creation, whether the highest and farthest, or the middle ones, or the lowest and closest, pray enlighten the friendly seekers and devotees about them. O lord of your own might of Prakrti and natural law, keep on the universal yajna by yourself, offering the fragrant havish and expanding the body form of the universe.