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य इ॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ जुह्व॒दृषि॒र्होता॒ न्यसी॑दत्पि॒ता न॑: । स आ॒शिषा॒ द्रवि॑णमि॒च्छमा॑नः प्रथम॒च्छदव॑राँ॒ आ वि॑वेश ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya imā viśvā bhuvanāni juhvad ṛṣir hotā ny asīdat pitā naḥ | sa āśiṣā draviṇam icchamānaḥ prathamacchad avarām̐ ā viveśa ||

पद पाठ

यः । इ॒मा । विश्वा॑ । भुव॑नानि । जुह्व॑त् । ऋषिः॑ । होता॑ । नि । असी॑दत् । पि॒ता । नः॒ । सः । आ॒ऽशिषा॑ । द्रवि॑णम् । इ॒च्छमा॑नः । प्र॒थ॒म॒ऽच्छत् । अव॑रान् । आ । वि॒वे॒श॒ ॥ १०.८१.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:81» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा प्रलय में सबको अपने में लीन कर लेता है, जीव मूर्च्छित हो जाते हैं, जीवन्मुक्त उसकी प्रेरणा से मोक्षानन्द भोगते हैं, संसार का मूल प्रकृति है इत्यादि विषय वर्णित हैं ।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (ऋषिः) सर्वद्रष्टा सर्वज्ञ परमेश्वर (होता) प्रलयकाल में सबको अपने में लेनेवाला (विश्वा भुवनानि) सब पृथिवी आदि लोक-लोकान्तरों को (जुहुत्) अपने में ग्रहण करता हुआ (नि-असीदत्) विराजता है (सः-नः पिता) वह हमारा पिता-जनक (आशिषा) आश्रयदान से (द्रविणम्) स्वबल-पराक्रम दर्शाने की (इच्छमानः) आकाङ्क्षा करता हुआ (प्रथमच्छत्) प्रथम उपादानकारण प्रकृति नामक को छादित करता है, प्रभावित करता है तथा, (अवरान्) पश्चात् उत्पन्न हुए जड-जङ्गमों को (आविवेश) अपनी व्याप्ति से आविष्ट प्रविष्ट होता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सर्वज्ञ परमात्मा प्रलयकाल में सारे लोक-लोकान्तरों को अपने में विलीन कर लेता है। इसके उपादानकारण प्रकृति को भी अपने अन्दर छिपा लेता है, पुनः उत्पन्न करता हुआ सब जड-जङ्गमों में अपनी व्याप्ति से प्रविष्ट रहता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रलय में व सृष्टि के प्रारम्भ में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रलयकाल में प्रभु इस सारे ब्रह्माण्ड की मानो अपने में आहुति दे डालते हैं। सारे पदार्थ प्रकृतिरूप हो जाते हैं वह प्रकृति प्रभु के सामर्थ्य के रूप में, प्रभु में ही रहती है। इस प्रकार उस समय एक प्रभु ही प्रभु प्रतीत होते हैं ' आनीदवातं संवधया तदेकम् । तस्माद्धान्यान्न परः किञ्चनास' [१० । १२९ । २] । जीव भी सब सुषुप्त-सी अवस्था में होते हैं । इसी से उपनिषद् कहती है कि 'नान्यत् किंचन मिषत् - और कुछ गतिमय न था । उस समय (यः) = जो (नः पिता) = हम सबके पिता [= रक्षक] प्रभु हैं वे (इमा विश्वा भुवनानि) = इन सब लोक-लोकान्तरों को (जुह्वत्) = अपने में आहुत करते हुए (ऋषिः) = तत्त्वद्रष्टा (होता) = सारे पिण्डों की अपने में आहुति देनेवाले के रूप में (न्यसीदत्) = अपने स्वरूप में स्थित होते हैं । [२] अब प्रलयकाल की समाप्ति पर (स) = वे प्रभु आशिषा- 'बहुस्यां प्रजायेय ''मैं बहुत हो जाऊँ [= बहुतों से जाना जाऊँ] इस संसार को उत्पन्न कर दूँ' इस इच्छा से (द्रविणम्) = ['सृ गतौ से संसार, गम् गतौ से जगत्, द्रुगतौ से द्रविणा] = संसार को (इच्छमान:) = चाहता हुआ (प्रथमच्छद्) = उन प्रथम उत्पन्न होनेवालों को अपने में आवृत करते हुए [प्रथमान् छादयति], जैसे अब बालक मातृ गर्भ में आवृत होता है उसी प्रकार सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु के मानस पुत्र प्रभु से आवृत थे । (अवरान्) = पीछे होनेवाले सब प्राणियों के अन्दर भी (आविवेश) = प्रविष्ट हो रहे हैं। हम सब के अन्दर प्रभु विद्यमान हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाले ये सब परमात्मा के गर्भ में थे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रलयकाल में सारे भुवन परमात्मा में आहुत हो जाते हैं, उस समय केवल प्रभु ही विद्यमान प्रतीत होते हैं । सृष्टि के प्रारम्भ में अपने मानस पुत्रों को प्रभु गर्भ में धारण करते हैं और पीछे होनेवाली इनकी प्रजाओं में वे प्रविष्ट हो रहे हैं ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमात्मा प्रलयकाले सर्वान् पदार्थान् स्वस्मिन् लीनीकरोति जीवाश्च तत्र मूर्च्छिता भवन्ति जीवन्मुक्तास्तु तत्प्रेरणया मोक्षानन्दं भुञ्जते मूलात् प्रकृतिरूपात् संसारमुत्पादयतीत्येवमादयो विषया वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-ऋषिः-होता) यः सर्वद्रष्टा सर्वज्ञः परमेश्वर: प्रलयकाले सर्वान् स्वस्मिन्नादाता "हु आदाने च" [जुहो॰] (विश्वा भुवनानि) सर्वाणि पृथिव्यादीनि लोकलोकान्तराणि (जुहुत्-नि-असीदत्) स्वस्मिन् गृह्णन् सन् विराजते (सः-नः पिता-आशिषा द्रविणम्-इच्छमानः) सोऽस्माकं पिता जनक आश्रयदानेन स्वबलं पराक्रमं दर्शयितुमाकाङ्क्षन् (प्रथमच्छत्-अवरान्-आविवेश) प्रथममुपादान-कारणं प्रकृत्याख्यं छादयति तथाभूतः स खल्ववरान् पश्चादुत्पन्नान् जडजङ्गमान् समन्ताद्विशति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The eternal Rshi, visionary creator and cosmic yajaka, our father generator, who calls up all these worlds of the universe into existence ever abides by himself. Moved with desire to give the wealth of life with his blessings to the souls, he first generates the original Prakrti vesting it with his divine will and then simultaneously enters and pervades the modes and forms of Prakrti as they evolve.