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भूरीदिन्द्र॑ उ॒दिन॑क्षन्त॒मोजोऽवा॑भिन॒त्सत्प॑ति॒र्मन्य॑मानम् । त्वा॒ष्ट्रस्य॑ चिद्वि॒श्वरू॑पस्य॒ गोना॑माचक्रा॒णस्त्रीणि॑ शी॒र्षा परा॑ वर्क् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bhūrīd indra udinakṣantam ojo vābhinat satpatir manyamānam | tvāṣṭrasya cid viśvarūpasya gonām ācakrāṇas trīṇi śīrṣā parā vark ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

भूरि॑ । इत् । इन्द्रः॑ । उ॒त्ऽइन॑क्षन्तम् । ओजः॑ । अव॑ । अ॒भि॒न॒त् । सत्ऽप॑तिः । मन्य॑मानम् । त्वा॒ष्ट्रस्य॑ । चि॒त् । वि॒श्वऽरू॑पस्य । गोना॑म् । आ॒ऽच॒क्रा॒णः । त्रीणि॑ । शी॒र्षा । परा॑ । वर्क् ॥ १०.८.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:8» मन्त्र:9 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्पतिः-इन्द्रः) सत्पुरुष स्वोपासक मुमुक्षु का पालक ऐश्वर्यवान् परमात्मा (भूरि-इत्-ओजः-उदिनक्षन्तं मन्यमानम्) स्वोपासकविरोधी, बहुत बल को प्राप्त हुए मन्यमान को (अव-अभिनत्) छिन्न-भिन्न कर देता है-नष्ट कर देता है, अतः (विश्वरूपस्य त्वाष्ट्रस्य चित्) सर्वप्राणिगत वीर्य से उत्पन्न शरीर के भी (गोनाम्-आचक्राणः) पुनर्जन्म में ले जानेवाले रश्मियों-लगामों को आहत करता हुआ (त्रीणि शीर्षा परा वर्क्) तीनों शिररूप स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरों को परे अलग कर देता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - मुमुक्षुजनों का पालक परमात्मा अपने मुमुक्षु उपासकों के विरोधी अपने को बड़ा बलवान् माननेवाले अभिमानी को छिन्न-भिन्न कर देता है। पुनः वीर्य से उत्पन्न प्राणिमात्र को प्राप्त, इस देह की लगामों को-पुनर्जन्म में ले जानेवाली लगामों को नष्ट करता है और तीनों देहों के शिरों को उपासक आत्मा से पृथक् कर उसे मोक्ष में पहुँचा देता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वासना विच्छेद व त्रिविध उन्नति

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्पति:) = सदा उत्तम [सत्] कर्मों में लगे रहने के द्वारा अपना रक्षण करनेवाला (इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता जितेन्द्रिय पुरुष (भूरि ओजः उदिनक्षन्तः) = बहुत अधिक शक्ति को व्याप्त करते हुए अर्थात् अतिशक्ति सम्पन्न होते हुए (मन्यमानं) = अपनी शक्ति के गर्व वाले अथवा प्रचण्ड [ क्रुध्यमानं सा० ] इस काम रूप असुर को (इत्) = निश्चय से (अवाभिनत्) = विदीर्ण करता है । 'काम' को नष्ट करने का सब से सुन्दर उपाय यही है कि 'उत्तम कर्मों में लगे रहना'। इस प्रकार काम को नष्ट करके (चित्) = निश्चय से (त्वाष्ट्रस्य) = उस दिव्यगुणों का निर्माण करनेवाले (विश्वरूपस्य) = व्यापक रूप वाले प्रभु की (गोनाम्) = इन्द्रियों के त्रीणि तीन (शीर्षाणी) = शिखरों को (आचक्राणः) = करने के हेतु से (परावर्क्) = इन आसुर वृत्तियों को सुदूर छिन्न-भिन्न कर देता है । इन्द्रियों के तीन शिखर 'ज्ञान, कर्म व उपासना' हैं। इनके दृष्टिकोण से उन्नत होने के लिए वासनाओं का विच्छेद आवश्यक है। यहाँ 'ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ' इस प्रकार इन्द्रियों की द्विविधता के साथ तीन शिखरों का समन्वय निम्न सूत्र से स्पष्ट हो जाता है- 'ज्ञान+कर्म-उपासना' । ज्ञान पूर्वक कर्म करना ही उपासना है । एवं उपासना भी ज्ञान कर्म के ही अन्तर्गत हो जाती है । एवं द्विविध इन्द्रियों से हम तीन शिखरों का आक्रमण करते हैं। परन्तु यह सब होता तभी है जब कि वासनाओं का हम विच्छेद करनेवाले बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अत्यन्त प्रबल 'काम' रूप शत्रु के नष्ट होने पर ही हम 'त्रिशिराः त्वाष्ट्र' बन पाते हैं। सूक्त का प्रारम्भ 'त्रिशिराः ' की व्याख्या से होता है, इसके मस्तिष्क में ज्ञान है, मन में प्रभु स्मरण, शरीर में रेतः कणों की व्याप्ति, [१] वह सदा प्रसन्न रहता है, कर्ममय जीवनवाला बनकर आनन्दित होता है, [२] यह आरोग्य साधन करके प्रभु उपासन में प्रवृत्त रहता है, [३] अभ्युदय की प्राप्ति के लिये यह 'अन्न-बल-धन- स्वास्थ्य-सन्तान - समयपालन व मित्रभाव रूप सात कदमों को रखता है, [४] प्रभु कृपा से हमारा जीवन ऋतमय बनता है, [५] हम हव्यपदार्थों का सेवन करते हैं, [६] प्रभु स्मरण के होने पर बाह्य अस्त्र हमारे लिये पुनरुक्त व व्यर्थ से हो जाते हैं, [७] हम इन्द्रियों को विषय बन्धन से मुक्त कर पाते हैं, [८] प्रचण्ड कामरूप शत्रु का संहार करते हैं, [९] इस कामरूप शत्रु के संहार रूप महान् कार्य में जलों का समुचित प्रयोग हमारे लिये अतिसहायक होता है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्पतिः-इन्द्रः) मुमुक्षुपालकः-ऐश्वर्यवान् परमात्मा (भूरि-इत्-ओजः-उदिनक्षन्तं मन्यमानम्) बहु खलु बलमुद्व्याप्नुवन्तं प्राप्तवन्तमात्मानं मन्यमानं कमपि (अव-अभिनत्) अवभिनत्ति-विनाशयति। सत्पुरुषस्य मुमुक्षोर्विरोधिनमिति यावत् तद्रक्षार्थं (विश्वरूपस्य त्वाष्ट्रस्य चित्) सर्वप्राणिगतस्य वीर्यादुत्पन्नस्य शरीरस्यापि च (गोनाम्-आचक्राणः) पुनर्जन्मनि गमयितॄन् रश्मीन् प्रग्रहानाहतान् कुर्वाणः (त्रीणि शीर्षा परा वर्क्) त्रीणि स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराणि परावर्जयति-पृथक्करोति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, protector and saviour of the pious and true devotees, destroying the mighty lustrous, rising and proud adversaries of the child of cosmic materiality, breaks the bonds of seven fold sense-mind complex, destroys the three headed cover of physicality and sets the soul free.