पदार्थान्वयभाषाः - (त्रितः) = 'त्रीन् मनोति' धर्म, अर्थ, काम तीनों का उचित रूप में विस्तार करनेवाला अथवा 'त्रीन् तरति’, ‘काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों को तैर जानेवाला (क्रतुना) = कर्म-संकल्प व प्रज्ञान के द्वारा (अस्य) = इस प्रभु का (वव्रे) = वरण करता है। प्रभु प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम शरीर में कर्मशक्ति सम्पन्न हों, अकर्मण्य को ही अशुभ विचार घेरा करते हैं। मन में उस प्रभु प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प हो और मस्तिष्क प्रज्ञान से उज्वल हो। ऐसा होने पर ही हम प्रभु को प्राप्त कर पाते हैं । यह व्यक्ति (एवैः) = अपनी सब गतियों व क्रियाओं से (परस्य पितुः) = उस परम पिता प्रभु ही (अन्तः) = [हृदयान्तरिक्ष] अन्त:करण में (धीतिम्) = धारणा को अथवा प्रज्ञा को [नि० १०.४१] (इच्छन्) = चाहता है। इसकी सारी क्रियाएँ इस उद्देश्य से होती हैं कि यह हृदय में प्रभु को धारण कर पाये । यह (पित्रोः) = द्यावापृथिवी के, मस्तिष्क व शरीर के उपस्थे गोद में, मस्तिष्क व शरीर के मध्य, अर्थात् हृदय में (सचस्यमानः) = उस प्रभु से सम्पर्क को प्राप्त करता हुआ [सच् to be associated] (आयुधानि) = तलवार, तोप, बन्दूक आदि अस्त्रों को (जामि) = [needless repetition] व्यर्थ की पुनरुक्ति-सा (ब्रुवाणः) = कहता हुआ (वेति) = इस संसार यात्रा में चलता है। प्रभु के सम्पर्क के होने पर मनुष्य को इतनी शक्ति प्राप्त हो जाती है कि उसके लिए इन बाह्य अस्त्रों की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वास्तव में तो सर्वत्र प्रभु दर्शन करने पर उसका किसी से वैर विरोध ही नहीं रहता, सो अस्त्रों का कोई उपयोग ही नहीं रह जाता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने हृदय में प्रभु का वरण करें, क्रियाशीलता के द्वारा हृदय में प्रभु का धारण करें। प्रभु से हमारा इस प्रकार सम्बन्ध हो कि हमारे लिये ये बाह्य अस्त्र निकम्मे हो जाए ।