मनीषा - महः [बुद्धि व तेज ]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार यज्ञों व प्राणसाधना को अपनानेवाले (ते) = वे लोग (हि) = निश्चय से (यज्ञेषु यज्ञियासः) = यज्ञों में यज्ञशील होते हैं, (ऊमाः) = इन यज्ञों के द्वारा इस लोक व परलोक का रक्षण करनेवाले बनते हैं। (आदित्येन) = सब स्थानों से अच्छाई को ग्रहण करने की वृत्ति से तथा (नाम्ना) = प्रभु नाम-स्मरण से अथवा नम्रता से (शंभविष्ठाः) = शान्ति को उत्पन्न करनेवाले हैं । [२] (ते) = वे आदित्य की वृत्तिवाले तथा प्रभु का स्मरण करनेवाले लोग (रथतू:) = [रथतुरः] शरीररूप रथ को त्वरा से मार्ग पर लक्ष्य की ओर ले चलनेवाले होते हैं । ये (नः) = हमारा भी (अवन्तु) = रक्षण करें। अपने जीवन के उदाहरण से हमारा मार्गदर्शन करते हुए ये हमें कल्याण- पथ का पथिक बनाते हैं। [३] ये व्यक्ति (अध्वरे) = यज्ञमय (यामन्) = जीवनमार्ग में (मनीषाम्) = बुद्धि को (महः च) = और तेजस्विता को (चकानाः) = चाहनेवाले होते हैं। इनकी कामना यही होती है कि इनका शरीर तेजस्वी हो तथा विज्ञानमय कोश सूक्ष्म बुद्धि से विभूषित हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधक पुरुषों की मूल कामना यही होती है कि वे 'बुद्धि व तेज' को प्राप्त करनेवाले बनें। सम्पूर्ण सूक्त प्राणसाधना के महत्त्व को व्यक्त कर रहा है। अगले सूक्त का भी विषय यही