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यू॒यं धू॒र्षु प्र॒युजो॒ न र॒श्मिभि॒र्ज्योति॑ष्मन्तो॒ न भा॒सा व्यु॑ष्टिषु । श्ये॒नासो॒ न स्वय॑शसो रि॒शाद॑सः प्र॒वासो॒ न प्रसि॑तासः परि॒प्रुष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yūyaṁ dhūrṣu prayujo na raśmibhir jyotiṣmanto na bhāsā vyuṣṭiṣu | śyenāso na svayaśaso riśādasaḥ pravāso na prasitāsaḥ paripruṣaḥ ||

पद पाठ

यू॒यम् । धूः॒ऽसु । प्र॒ऽयुजः॑ । न । र॒श्मिऽभिः॑ । ज्योति॑ष्मन्तः । न । भा॒सा । विऽउ॑ष्टिषु । श्ये॒नासः॑ । न । स्वऽय॑शसः । रि॒शाद॑सः । प्र॒वासः॑ । न । प्रऽसि॑तासः । प॒रि॒ऽप्रुषः॑ ॥ १०.७७.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:77» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:10» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यूयम्) हे विद्वानों ! तुम (धूर्षु प्रयुजः) धारणीय ज्ञानप्रबन्धों में प्रकृष्टरूप से नियुक्त करनेवाले होते हुए (रश्मिभिः-न) जैसे लगामों से घोड़ों को नियोजित करते हैं, वैसे हमें नियुक्त करो (भासा ज्योतिष्मन्तः-न) जैसे ज्ञानज्योति ज्ञान का प्रकाश करते हुए (व्युष्टिषु) विशिष्ट ज्ञान-स्थलियों में मनुष्यों के लिए ज्ञानज्योति प्रदान करते हो, उसी भाँति (श्येनासः-न) अथवा प्रशंसनीय (स्वयशसः) स्वाधार यशवाले महात्मा अथवा (रिशादसः-प्रवासः-न) हिंसक दोषों को फेंकनेवाले प्रवास करते हुए अतिथि प्रवक्ता जन (प्रसितासः परिप्रुषः) प्रकृष्ट निर्मल पवित्राचरण अपने उपदेश अमृत से मनुष्यों को सब ओर से सींचते हैं, वैसे हम पर अनुग्रह करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् जन अपनी ज्ञानस्थलियों में हमें नियुक्त करें, ज्ञान से और शुभाचरण से हमें प्रसाधित करें। जैसे वे यशस्वी हैं, वैसे हमें उपदेशामृत देकर निर्दोष बनाएँ ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

लक्ष्य की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे [मरुतः = ] प्राणसाधक पुरुषो! (यूयम्) = आप (रश्मिभिः) = प्रग्रहों, लगामों के कारण (धूर्षु) = रथ के जुए में जुते हुए (प्रयुजः न) = प्रकृष्ट घोड़ों के समान हो । जैसे रश्मियों से युक्त घोड़े इष्ट-स्थान पर ले जानेवाले होते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों पर नियन्त्रणवाले ये प्राणसाधक पुरुष अपने को लक्ष्य पर प्राप्त करानेवाले होते हैं । [२] ये (भासा) = दीप्ति से (व्युष्टिषु) = उषाओं के होने पर (ज्योतिष्मन्तः न) = ज्योतिवाले सूर्यादि के समान होते हैं । प्राणसाधना से ज्ञान ज्योति इस प्रकार दीप्त होती है, जैसे उषाकाल में सूर्य चमकता है । [३] (श्येनासः न) = बाज पक्षी के समान (रिशादसः) = [रिश अदस्] शत्रुओं के समाप्त करनेवाले (स्वयशसः) = अपने कर्मों से यशस्वी होते हैं प्राणसाधना से काम-क्रोधादि शत्रुओं का संहार होता है और यह साधक उत्तम कर्मोंवाला होकर यशस्वी जीवनवाला बनता है । [४] ये साधक (प्रवासः न) = प्रवासी पुरुषों की तरह, पथिकों की तरह (प्रसितास:) = [intention, longing for, craering after ] लक्ष्य पर पहुँचने के लिये प्रबल उत्सुकतावाले और अतएव (परिप्रुषः) = [परितो गन्तारः ] खूब गतिवाले होते हैं। लक्ष्य मार्ग की ओर ये निरन्तर बढ़ रहे होते हैं, इनकी सब क्रियाएँ लक्ष्य प्राप्ति के लिये होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधक पुरुष संयत-जीवनवाले, ज्योतिष्मान्, यशस्वी कर्मोंवाले तथा निरन्तर गतिशील होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यूयम्) हे विद्वांसः ! यूयं (धूषु-प्रयुजः) धारणीयेषु ज्ञानप्रबन्धेषु “धूर्वते धूर्धारयतेर्वा-अस्मान्” [निरु० ३।९] प्रयोक्तारः प्रकृष्टेन नियोक्तारः सन्तः (रश्मिभिः-न) यथा प्रग्रहैरश्वान् प्रयोजयन्ति तथाऽस्मान् प्रयोजयितारः सन्तः (भासा-ज्योतिष्मन्तः-न) यथा वा ज्योतिषा ज्ञानज्योतिषा ज्ञानप्रकाशवन्तः (व्युष्टिषु) विशिष्टज्ञानस्थलीषु जनेभ्यो ज्ञानज्योतिः प्रयच्छन्ति, तद्वत्, (श्येनासः-न स्वयशसः) यद्वा यथा शंसनीयाः स्वाधारयशस्विनो महात्मानस्तथा किं वा (रिशादसः प्रवासः-न) हिंसकान् दोषान् क्षेप्तारः प्रवसन्तोऽतिथयः प्रवक्तारः (प्रसितासः परिप्रुषः) प्रकृष्टनिर्मलाः पवित्राचरणा जनान् स्वोपदेशेनामृतेन परितः सिञ्चन्ति ये तथाभूता अस्माननुगृह्णन्तु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In our programmes of progress, be like the motive powers of the plan with rays of light and reins of control. Be like light givers with sun-light on the rise of the dawns of initiative on a new day. Self- refulgent and glorious like harbingers of soma, be destroyers of violence and negativity. Like world- travellers, shining and sinless on meticulous missions, be harbingers of universal showers of rain and prosperity.