पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे [मरुतः = ] प्राणसाधक पुरुषो! (यूयम्) = आप (रश्मिभिः) = प्रग्रहों, लगामों के कारण (धूर्षु) = रथ के जुए में जुते हुए (प्रयुजः न) = प्रकृष्ट घोड़ों के समान हो । जैसे रश्मियों से युक्त घोड़े इष्ट-स्थान पर ले जानेवाले होते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों पर नियन्त्रणवाले ये प्राणसाधक पुरुष अपने को लक्ष्य पर प्राप्त करानेवाले होते हैं । [२] ये (भासा) = दीप्ति से (व्युष्टिषु) = उषाओं के होने पर (ज्योतिष्मन्तः न) = ज्योतिवाले सूर्यादि के समान होते हैं । प्राणसाधना से ज्ञान ज्योति इस प्रकार दीप्त होती है, जैसे उषाकाल में सूर्य चमकता है । [३] (श्येनासः न) = बाज पक्षी के समान (रिशादसः) = [रिश अदस्] शत्रुओं के समाप्त करनेवाले (स्वयशसः) = अपने कर्मों से यशस्वी होते हैं प्राणसाधना से काम-क्रोधादि शत्रुओं का संहार होता है और यह साधक उत्तम कर्मोंवाला होकर यशस्वी जीवनवाला बनता है । [४] ये साधक (प्रवासः न) = प्रवासी पुरुषों की तरह, पथिकों की तरह (प्रसितास:) = [intention, longing for, craering after ] लक्ष्य पर पहुँचने के लिये प्रबल उत्सुकतावाले और अतएव (परिप्रुषः) = [परितो गन्तारः ] खूब गतिवाले होते हैं। लक्ष्य मार्ग की ओर ये निरन्तर बढ़ रहे होते हैं, इनकी सब क्रियाएँ लक्ष्य प्राप्ति के लिये होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधक पुरुष संयत-जीवनवाले, ज्योतिष्मान्, यशस्वी कर्मोंवाले तथा निरन्तर गतिशील होते हैं ।