पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मर्यासः) = मनुष्य (श्रिये) = शोभा की प्राप्ति के लिये (अञ्जीन् अकृण्वत) = आभरणों को करते हैं। आभरणों से शरीर की शोभा को बढ़ाने के लिये यत्नशील होते हैं। परन्तु (सुमारुतम्) = इस उत्तम मरुतों के [प्राणों के] गण को (पूर्वीः क्षपः) = बहुत भी नाशक शत्रु (न अति) [क्रम्य वर्तन्ते ] = नहीं लाँघ पाते हैं। इन मरुतों के गण के सामने हमारे इन शत्रुओं की शक्ति शान्त हो जाती है। इन शत्रुओं के शान्त हो जाने पर न शरीर में रोग आते हैं, नांही मन में राग आ पाते हैं। इस प्रकार शरीर को स्वस्थ बनाकर तथा मन को निर्मल बनाकर ये मरुत् हमारी शोभा को बढ़ानेवाले होते हैं। आभरणों द्वारा प्राप्त शोभा कृत्रिम थी, यह मरुतों से प्राप्त करायी गयी शोभा वास्तविक है, इसे ही प्राप्त करना बुद्धिमत्ता है । [२] इन मरुतों की साधना करनेवाले लोग (दिवस्पुत्रासः) = ज्ञान के पुतले [पुञ्ज] बनते हुए (एताः न) = गतिशील व्यक्तियों की तरह (येतिरे) = सदा शोभा को प्राप्त करने के लिये यत्नशील होते हैं। आदित्यासः ते सदा सद्गुणों का आदान करनेवाले वे प्राणसाधक (अक्राः न) = शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले वीरों के समान (वावृधुः) = खूब ही वृद्धि को प्राप्त होते हैं। शत्रुओं को परास्त करते हुए, सद्गुणों का आदान करते हुए ये सचमुच अपनी शोभा को बढ़ा पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से प्राप्त होनेवाली शोभा ही वास्तविक शोभा है, आभरणों से वह शोभा अप्राप्य है।