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अ॒भ्र॒प्रुषो॒ न वा॒चा प्रु॑षा॒ वसु॑ ह॒विष्म॑न्तो॒ न य॒ज्ञा वि॑जा॒नुष॑: । सु॒मारु॑तं॒ न ब्र॒ह्माण॑म॒र्हसे॑ ग॒णम॑स्तोष्येषां॒ न शो॒भसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhrapruṣo na vācā pruṣā vasu haviṣmanto na yajñā vijānuṣaḥ | sumārutaṁ na brahmāṇam arhase gaṇam astoṣy eṣāṁ na śobhase ||

पद पाठ

अ॒भ्र॒ऽप्रुषः॑ । न । वा॒चा । प्रु॒ष॒ । वसु॑ । ह॒विष्म॑न्तः । न । य॒ज्ञाः । वि॒ऽजा॒नुषः॑ । सु॒ऽमारु॑तम् । न । ब्र॒ह्माण॑म् । अ॒र्हसे॑ । ग॒णम् । अ॒स्तो॒षि॒ । ए॒षा॒म् । न । शो॒भसे॑ ॥ १०.७७.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:77» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में जीवन्मुक्त विद्वानों से ज्ञान ग्रहण करके मनुष्य सांसारिक सुख और मोक्षानन्द के अधिकारी बनते हैं इत्यादि विषय कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अभ्रप्रुषः-न) मेघ से सींचे जाते हुए जलबिन्दु जैसे प्राप्त होते हैं, वैसे (वाचा) स्तुति से प्रसन्न हुए जीवन्मुक्त विद्वान् (वसुप्रुष) ज्ञान-धनों से सींचते हैं (हविष्मन्तः) आहुतिवाले (यज्ञाः) यजमान लोग (न विजानुषः) सुख के विशेषरूप से उत्पन्न करनेवाले लोगों के लिए जैसे होते हैं, वैसे तुम सुख देओ (एषाम्) इन जीवन्मुक्तों को (ब्रह्माणम्) महान् (सुमारुतम्) व्यवस्थित (गणम्) मण्डल की (न अर्हसे) सम्प्रति प्रशंसा कर, उनके सत्कार के लिए (न शोभसे) सम्प्रति भाषण के लिए (अस्तोषि) प्रशंसा कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - जीवन्मुक्त महानुभावों की प्रशंसा करनी चाहिए, वे अपने अमृतभाषण को बरसाते हैं, जैसे मेघ जल बरसाते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना से भी योग्यता व शोभा की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अभ्रप्रुषः न) = [प्रुष् सेचने] जैसे आधिदैविक क्षेत्र में मरुत् [मौनसून विण्ड्स] बादलों से सम्पूर्ण क्षेत्रों को भूमियों को सिक्त करनेवाले हैं, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र में ये (मरुत्) = प्राण (वाचा प्रुषाः) = वेदवाणी के द्वारा हमें ज्ञान से परिपूर्ण करनेवाले हैं। [प्रुष्, पूरणे: ] । प्राणसाधना से सोम शक्ति का रक्षण होता है, यह ज्ञानाग्नि को दीप्त करती है और हम वेदज्ञान से अपने को भर पाते हैं । [२] (हविष्मन्तः यज्ञाः न) = जिन में उत्तम हव्य पदार्थ डाले गये हैं उन यज्ञों के समान ये मरुत् (वसु) = धनों को (विजानुषः) = विविध रूपों में उत्पन्न करते हैं। यज्ञों से पर्जन्य [बादल] होता है बादल से अन्न । यह अन्न ही सर्वमुख्य वसु है। शरीर में प्राण भी इसी प्रकार वसुओं को जन्म देनेवाले होते हैं। निवास के लिये आवश्यक तत्त्व इन वसुओं से ही प्राप्त होते हैं । एवं प्राणसाधना से जहाँ ज्ञान बढ़ता है, वहाँ निवास के लिये आवश्यक सब वसुओं का, तत्त्वों का उत्पादन भी होता है। [३] यह सचमुच ही मेरे दौर्भाग्य की बात है कि (अर्हसे) = योग्यता के सम्पादन के लिये (ब्रह्माणम्) = वृद्धि के कारणभूत (सुमारुतं गणम्) = मरुतों के इस शुभ गण को (न अस्तोषि) = मैंने आज तक स्तुत नहीं किया। (एषाम्) = इन मरुतों के गण की (शोभसे) = शोभा की प्राप्ति के लिये (न) = मैं स्तुति नहीं कर पाया। इनकी स्तुति के द्वारा ही तो मुझे योग्यता व शोभा प्राप्त होनी थी। सो मैं इन की स्तुति में प्रवृत्त होऊँ जिससे अपनी योग्यता व शोभा की वृद्धि का करनेवाला बनूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राण साधना ही तो प्राणों का स्तवन है, प्राणायाम मेरे दैनिक जीवन को कार्यक्रम का मुख्य अंग हो ।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते जीवन्मुक्तेभ्यो ज्ञानं गृहीत्वा जनाः सांसारिकसुखस्य मोक्षानन्दस्य च अधिकारिणो भवन्तीत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - अभ्रप्रुषः-न) (यथा मेघात् सिच्यमाना जलबिन्दवः “प्रुषायत् सिञ्चत्” [ऋ० १।१२१।२ दयानन्दः] प्राप्यन्ते तथा (वाचा) स्तुत्या प्रसन्नाः सन्तो जीवन्मुक्ता विद्वांसः (वसुप्रुष) वसूनि ज्ञानधनानि सिञ्चन्ति ‘व्यत्ययेन बहुवचने-एकवचनम्’ (हविष्मन्तः-यज्ञाः न-विजानुषः) आहुतिमन्तो यजमानाः “यज्ञो वै यजमानः” [जै० १।२५९] सुखस्य विशेषेण जनयितारो लोकेभ्यो भवन्ति तथा यूयं सुखयत (ब्रह्माणं सुमारुतं गणं न-अर्हसे) एतेषां जीवन्मुक्तानां महान्तं व्यवस्थितं गणं “मरुतो ह वै-देवविशः” (कौ० ७।८) सम्प्रति “नकारः सम्प्रत्यर्थे” [निरुक्त ६।८] तेषां सत्काराय (न शोभसे) तथा च भाषणाय “शुभ भाषणे” [भ्वादि०] (अस्तोषि) प्रशंसय “स्तुहि प्रशंसय” [ऋ० १।२२।६ दयानन्दः] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like clouds of rain bringing showers of wealth and fertility to the earth, like yajakas bearing sacred offerings for the fire and replenishing the vitality of the environment, the vibrant currents of cosmic mind and holy sages of the divine Word bless humanity with the Vedic voice. Now, in order to do them the honour they deserve, sing and adore the assembly of the sages like the divine currents of Maruts, and do so in order that you too may deserve the honour and appreciation you would win.