पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋजीती) = [ऋजुना अतति] सरल मार्ग से चलने की वृत्ति जो (एनी) = श्वेतवर्णवाली है, जिसमें कहीं भी कलंक का चिह्न नहीं है, (रुशती) = जो कि अन्तः ज्ञानदीप्ति से देदीप्यमान है वह (महित्वा) = अपनी महिमा से हमारे अन्दर ज्रयांसि वेगवाले (रजांसि) = कर्मों को (परिभरते) = सब ओर से भरती है । ऋजीती का भाव सरल मार्ग से चलता है। इस सरल मार्ग से चलने में कहीं भी मलिनता नहीं आ पाती। यह मार्ग शुद्ध व श्वेत बना रहता है, कलंकित नहीं होता। इस मार्ग से चलने पर ही अन्ततः अन्तदर्शन दीप्ति की प्राप्ति होती है। इस ज्ञानदीप्ति से हमारे कार्य जहाँ पवित्र होते हैं वहाँ सबल व वेगवान् होते हैं । [२] इस प्रकार यह (सिन्धुः) = रेतःकण (अपसां अपसामा) = क्रियाशीलों में अत्यन्त क्रियाशील हैं। ये हमें शक्ति सम्पन्न करके अकर्मण्यता से ऊपर उठाते हैं । अदब्धा- ये कभी हिंसित नहीं होते, रोगादि का इन पर आक्रमण नहीं हो पाता । ये रोगों को आक्रान्त करके हमारी इस तनू [शरीर] को (अश्वा न चित्रा) = एक घोड़े की तरह अद्भुत शक्तिवाला बनाते हैं। और (वपुषी इव) = एक उत्तम उत्तम शरीरवाली युवति के समान (दर्शता) = सचमुच सौन्दर्य के कारण दर्शनीय हमारा शरीर होता है। ये सिन्धु दर्शनीय है, अर्थात् रेतःकण इस दर्शनीयता का जनक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रेतः कणों के रक्षण का परिणाम यह है कि हम [क] सरल शुद्ध मार्ग से सब गतियों को करनेवाले होते हैं और हमें [ख] अन्तर्ज्ञान की शुभ्र - ज्योति प्राप्त होती है। इस प्रकार यह सिन्धु 'ऋजीती' है, 'रुशती' है।