दोनों प्रान्तों का प्राशस्त्य
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (न) = जिस प्रकार (वाश्राः) = शब्द करनेवाली (धेनवः) = दूध को पिलानेवाली (मातरः) = गौवें (पयसा) = दूध के साथ (इत्) = निश्चय से (शिशुं इव) = बछड़े को ही (अर्षन्ति) = प्राप्त होती हैं [इव = एव], उसी प्रकार सब प्रजाएँ हे (सिन्धो) = रेतःकणो ! (त्वा अभि) = तेरा ही लक्ष्य करके गतिवाली होती हैं। जैसे गौ की सब क्रियाएँ नवोत्पन्न बछड़े के उद्देश्य से ही होती हैं, जैसे माता की सब क्रियाएँ बच्चे के हित के लिये होती हैं, उसी प्रकार प्रजाओं की सब क्रियाएँ इस (सिन्धुः आपः) = रेतः कणों के रक्षण के लिये ही होती हैं । [२] (यद्) = जब (त्वम्) = तू (आसाम्) = इन (अग्रं प्रवताम्) = आगे गति करती हुई इन प्रजाओं को (इनक्षसि) = व्याप्त करता है अथवा प्राप्त होता है तो (युध्वा राजा इव) = एक युद्ध करनेवाले राजा की तरह (इत्) = निश्चय से (सिचौ नयसि) = प्रान्तों को प्राप्त कराता है, एक प्रान्त पृथिवीरूप शरीर है तो दूसरा प्रान्त द्युलोकरूप मस्तिष्क है। तू शरीर व मस्तिष्क दोनों की ही उन्नति करनेवाला होता है । शरीर को तू शक्ति प्राप्त कराता है, तो मस्तिष्क को ज्ञान
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारी सब क्रियाएँ रेतः रक्षण के उद्देश्य से होनी चाहिएँ । ये रक्षित रेतःकण हमारे शरीर को दृढ़ बनायेंगे और मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त ।