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प्र ते॑ऽरद॒द्वरु॑णो॒ यात॑वे प॒थः सिन्धो॒ यद्वाजाँ॑ अ॒भ्यद्र॑व॒स्त्वम् । भूम्या॒ अधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ सानु॑ना॒ यदे॑षा॒मग्रं॒ जग॑तामिर॒ज्यसि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra te radad varuṇo yātave pathaḥ sindho yad vājām̐ abhy adravas tvam | bhūmyā adhi pravatā yāsi sānunā yad eṣām agraṁ jagatām irajyasi ||

पद पाठ

प्र । ते॒ । अ॒र॒द॒त् । वरु॑णः । यात॑वे । प॒थः । सिन्धो॒ इति॑ । यत् । वाजा॑न् । अ॒भि । अद्र॑वः । त्वम् । भूम्याः॑ । अधि॑ । प्र॒ऽवता॑ । या॒सि॒ । सानु॑ना । यत् । ए॒षा॒म् । अग्र॑म् । जग॑ताम् । इ॒र॒ज्यसि॑ ॥ १०.७५.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:75» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धो) हे स्यन्दनशील अन्तरिक्षस्थ जलप्रवाह ! (वरुणः) सबका वरण करने योग्य या आवरक परमात्मा (ते यातवे) तेरे गमन-बहने के लिये (पथः प्र-अरदत्) मार्गों को बनाता है, (त्वं यत्) तू जो (वाजान्-अभ्यद्रवः) अन्नौषधी आदि पदार्थों को अभिलक्षित करके बहता है (सानुना प्रवता) पृथिवी के ऊपरी भाग से नीचे को (भूम्याः-अधि यासि) भूमि के नीचे जाता है (एषां-जगताम्-अग्रम्) जङ्गमादि के प्रथम सुख साधने को (यत्-इरज्यसि) जो परिचरण करता है-घूमता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की शक्ति से जलप्रवाह पृथिवी के ऊपरी भाग से नीचे को बहते हैं, अन्न औषधि आदि के उत्पत्त्यर्थ तथा मनुष्यादि प्राणियों के सुखसाधनार्थ गति करते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वरुणः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वरुणः) = सब अशुभों का निवारण करनेवाला प्रभु (ते यातवे) = हे सिन्धो [= आपः ] तेरी गति के लिये (पथः) = मार्गों को (अरदत्) = बनाता है। गत मन्त्र के अनुसार यह शरीर उस विवस्वान् [प्रकाशमय] प्रभु का ही है। उस प्रभु से जीव को यह कर्मरूप भाटक [किराये ] के अनुसार दिया जाता है। उस परमात्मा ने इस सिन्धु की गति के लिये शरीर में मार्गों को बनाया है। ये मार्ग ही ऊपर की ओर जानेवाले 'उत्तरायण' व नीचे की ओर जानेवाले 'दक्षिणायन' के नाम से कहलाते हैं । [२] हे सिन्धो ! हे रेतः ! (त्वम्) = तू ही (यद्) = जब (अद्रवः) = इन मार्गों से गति करता है तो (वाजान्) = अंग-प्रत्यंगों की शक्तियों को (अभि) = लक्ष्य बनाकर ही गति करता है । इस गति मैं तू (भूम्याः अधि) = इस शरीर रूप पृथिवी से ऊपर (सानुना प्रवता) = समुच्छ्रित मार्ग से (यासि) = आता है । मस्तिष्क की ओर जानेवाला मार्ग ही समुच्छ्रित मार्ग है । यद्-जब तू इस मार्ग से चलता है तो (एषां जगताम्) = इन गतिशील मनुष्यों के (अग्रम्) = सर्वोत्कृष्ट प्रदेश इस मस्तिष्क को, शरीर के अन्दर के इस द्युलोक को (इरज्यसि) = तू ऐश्वर्ययुक्त करता है। इन रेतः कणों की ऊर्ध्वगति होने पर मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि समुचित ईंधन को प्राप्त करके चमक उठती है। [३] दक्षिणायन से गति करने पर ये (आपः) = रेतःकण उत्तम प्रजाओं को जन्म देनेवाले होते हैं और उत्तरायण से गति करने पर ज्ञानसूर्य के उदय का कारण बनते हैं। रुधिर के साथ व्याप्त हुए-हुए ये रेतःकण विविध नाड़ी रूप नदियों से सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ने शरीरस्थ रेतःस रूप जलों के प्रवाह के लिये नाड़ीरूप नदियों का निर्माण किया है। इन मार्गों से ये नीचे ऊपर सर्वत्र विचरते हैं । सर्वोत्कृष्ट स्थान मस्तिष्क को ये ही प्रकाशरूप ऐश्वर्य से युक्त करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धो) हे स्यन्दनशील जलप्रवाह ! (वरुणः) सर्वेषां वरणीयः “आवरको वा परमात्मा” [ऋ० १।९८।३ दयानन्दः] (ते यातवे) तव गमनाय प्रवहणाय (पथः-प्र-अरदत्) मार्गान् प्ररचयति (त्वं यत्-वाजान्-अभ्यद्रवः) यतस्त्वं-अन्नौषध्यादिपदार्थान्-अभिलक्ष्य द्रवसि-वहसि, (सानुना प्रवता भूम्याः-अधि-यासि) पृथिव्याः-अधि, पृथिव्याः-उपरि, पृथिव्यामित्यर्थः, अधि सप्तम्यार्थाभिधायी, समुद्धृतेन-समुच्छृतात्-मेघात् पतिता सती “सानु मेघस्य शिखरः” [ऋ० १।५८।२ दयानन्दः] निम्नस्थानक्रमेण “प्रवत्सु निम्नासु” [ऋ० ६।४७।४ दयानन्दः] गच्छसि (एषां जगताम्-अग्रं यत्-इरज्यसि) एषां जङ्गमानां यद्वा जङ्गमादीनां प्रथमं सुखं साधयितुं परिचरसि “इरज्यति परिचरणकर्मा” [निघ० ३।५] ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O flowing stream, as you flow for the energy and vitality of foods in plants, herbs and trees, or as you flow by the tops of mountains of the earth or as you elevate the first and best part of these living and moving forms of nature with pranic energy, the sun makes the path for your flow.