भक्त की भावना का भरण करनेवाले प्रभु
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (पुरुतमम्) = उस सर्वमहान् पालन व पूरण करनेवाले प्रभु को (वावान) = खूब ही उपासित करता है तब ये प्रभु (पुराषाट्) = असुरों की तीनों पुरियों का विध्वंस करनेवाले होते हैं, कामादि असुर 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' में अपना अधिष्ठान बनाते हैं, उपासित होने पर प्रभु इन अधिष्ठानों का विध्वंस कर देते हैं और इस प्रकार (वृत्र - हा) = वे प्रभु ज्ञान पर आवरण के रूप में आ जानेवाले 'वृत्र' को नष्ट कर डालते हैं। मन्मथ [ज्ञान के नाशक] के विध्वंस से प्रभु हमारे जीवन को प्रकाशमय बनाते हैं । [२] प्रकाशमय जीवनवाला यह (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरु (नामानि) = प्रभु के नामों को (आ अप्राः) = अपने में पूरित करता है, अर्थात् प्रभु के नामों का जप करता है और उनके अर्थ का भावन करता हुआ उन बातों को अपने जीवन का अंग बनाता है । यही नामों का अपने में भरना है । [३] इस भक्त से वे प्रभु (अचेति) = इस रूप में जाने जाते हैं कि - [क] (प्रासहः) = ये शत्रुओं का प्रकर्षेण पराभव करनेवाले हैं, हमारे काम-क्रोधादि को कुचलनेवाले हैं। [ख] (पतिः) = इस प्रकार हमारा रक्षण करनेवाले हैं। शत्रुओं के नाश के द्वारा हमें शत्रुओं से नष्ट किये जाने से बचाते हैं। [ग] (तुविष्मान्) = वे प्रभु अनन्त धन-धान्यवान् हैं [तुवि = बहुत] । उस प्रभु के उपासक को किसी प्रकार की कमी नहीं रहती । इसका योगक्षेम बखूवी चलता है । [४] इस प्रभु की उपासना करते हुए हम (यद्) = जो कुछ (ईम्) = निश्चय से कर्तवे करने के लिये (उश्मसि) = चाहते हैं (तत् करत्) = प्रभु उसको पूर्ण कर देते हैं । उपासक चाहता है, प्रभु सब साधन जुटा देते हैं और वह चीज पूर्ण हो ही जाती है। वस्तुतः सब करनेवाले तो वे प्रभु ही हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु-भक्त की सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वह जो चाहता है प्रभु उसे पूर्ण कर देते हैं। सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि हम प्रभु को धारण करते हैं प्रभु हमें शक्ति, धन व ज्ञान देते हैं। [१] इन चीजों को देकर वे प्रभु भक्त के सब कार्यों का पूरण करते हैं, [४] यह भक्त प्रभु के आदेश के अनुसार रेतःकणों का स्वामी बनता है, 'सिन्धुक्षित्' [सिन्धुः आपः- रेतः, क्षि] । इनके रक्षण से ही तो वह शरीर में शक्तिशाली बनेगा और मस्तिष्क में ज्ञान सम्पन्न । यह रेतः कणों के रक्षण से बुद्धि को दीप्त करता है, 'प्रियमेध' होता है। यह इन 'आप' की स्तुति करता हुआ कहता है कि-