पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शचीवः) = हे प्रज्ञा व कर्म सम्पन्न भक्त पुरुषो! (इन्द्रम्) = उस सर्वशक्तिमान् प्रभु को (अवसे) = रक्षण के लिये (कृणुध्वम्) = करो, अपना रक्षक जानो जो कि (अनानतम्) = कभी किसी से दबनेवाले नहीं हैं, (पृतन्यून् दमयन्तम्) = सेना से आक्रमण करनेवालों का दमन करनेवाले हैं, (ऋभुक्षणम्) = महान् हैं, (मघवानम्) = ऐश्वर्यवान् हैं और (सुवृक्तिम्) - दोषों को अच्छी प्रकार दूर करनेवाले हैं। इस प्रकार प्रभु जब रक्षक होते हैं तो किसी प्रकार का भय नहीं रहता । प्रभु रक्षण में काम-क्रोधादि के आक्रमण का तो सम्भव ही नहीं, लोभ जनित दोषों से हम बचे रहते हैं और सांसारिक दृष्टिकोण से भी हम असफल जीवनवाले नहीं होते । [२] हम प्रज्ञाकर्म सम्पन्न बनकर उस प्रभु को अपना रक्षक बनायें (यः) = जो कि (पुरुक्षुः) = [क्षु-शब्दे] पालक व पूरक प्रेरणात्मक शब्दोंवाले होते हुए (नर्य) = नर हितकारी (वज्रम्) = क्रियाशीलतारूप वज्र को (भर्ता) = भरण करनेवाले हैं। हृदयस्थित होते हुए वे प्रभु सदा प्रेरणा देते हैं, वह प्रेरणा हमें शरीर में रोगों से बचाती है तो मन में न्यूनताओं को नहीं आने देती । प्रभु इस प्रेरणा के द्वारा वज्र को हमारे हाथों में देते हैं, 'क्रियाशीलता' ही यह वज्र है। यह वज्र 'नर्य' है, नर हितकारी है। सदा क्रियाशील होने पर हम वासनाओं के शिकार नहीं होते । वस्तुतः क्रियाशील व्यक्ति शक्ति सम्पन्न बनता है, यह किसी से दबता नहीं [अनानत] बाह्य शत्रुओं का भी तेजस्विता से मुकाबिला करनेवाला होता है, अपने जीवन में महान् बनता है, दोषों को सदा दूर रख पाता है। इस प्रकार यह अपने उपास्य प्रभु का ही छोटारूप बन जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - क्रियाशीलतारूप वज्र को हाथों में लेकर हम शत्रुओं पर विजय पायें और अपने उपास्य प्रभु जैसा ही बनने का प्रयत्न करें।