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आ तत्त॑ इन्द्रा॒यव॑: पनन्ता॒भि य ऊ॒र्वं गोम॑न्तं॒ तितृ॑त्सान् । स॒कृ॒त्स्वं१॒॑ ये पु॑रुपु॒त्रां म॒हीं स॒हस्र॑धारां बृह॒तीं दुदु॑क्षन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tat ta indrāyavaḥ panantābhi ya ūrvaṁ gomantaṁ titṛtsān | sakṛtsvaṁ ye puruputrām mahīṁ sahasradhārām bṛhatīṁ dudukṣan ||

पद पाठ

आ । तत् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । आ॒यवः॑ । प॒न॒न्त॒ । अ॒भि । ये । ऊ॒र्वम् । गोऽम॑न्तम् । तितृ॑त्सान् । स॒कृ॒त्ऽस्व॑म् । ये । पु॒रु॒ऽपु॒त्राम् । म॒हीम् । स॒हस्र॑ऽधाराम् । बृ॒ह॒तीम् । दुधु॑क्षन् ॥ १०.७४.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:74» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (ते) तेरे (आयवः) प्रजाजन (तत्-आ-अभिपनन्त) तब भलीभाँति प्रशंसा करते हुए (ये गोमन्तम्) जो पृथिवीवाले भूमिवाले (ऊर्वं-तितृत्सान्) भूमि के आच्छादक धान्य को काटना चाहते हैं एवं तेरी प्रसन्नता को अनुभव करते हुए (ये सकृत्स्वम्) जो एक बार ही उत्पन्न करनेवाली (पुरुपुत्राम्) बहुत धान्यादि पुत्रवाली को (सहस्रधाराम्) सहस्रजल धारावाली (बृहतीं महीं दुधुक्षन्) महत्त्वपूर्ण पृथिवी को दोहते हैं, तो उससे धान्य फलादि ग्रहण करते हैं ॥४॥ 
भावार्थभाषाः - राजा के राज्य में पृथिवी जलधाराओं से युक्त अन्नफलादि उत्पन्न करनेवाली होवे, तो प्रजाजन सुख  पाते हुए शासक को प्रसन्न करते हैं और गुण गाते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जितेन्द्रिय बनकर वेदवाणी रूप गौ का दोहन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते आयवः) = वे मनुष्य (तत् आपनन्त) = वह आपका स्तवन करते हैं, (ये) = जो (गोमन्तम्) = इन्द्रियों से बने हुए (ऊर्वम्) = समूह को (तितृत्सान्) = मारने की कामना करते हैं । 'इन्द्रियों को मारना', अर्थात् 'इन्द्रियों को वश में करना' यही वस्तुतः प्रभु का सच्चा पूजन होता है । जितेन्द्रिय पुरुष प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठता है और प्रभु की सच्ची उपासन करनेवाला होता है । [२] ये उपासक वे होते हैं (ये) = जो (महतीम्) = इस अत्यन्त आदर के योग्य वेदवाणी का (दुदुक्षन्) = दोहन करने की कामना करते हैं। यह वेदवाणी [क] (महीम्) = अत्यन्त महनीय है, अर्थ के गौरव से पूर्ण है । [ख] सहस्त्रधाराम् शतशः ज्ञानधाराओं से हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाली है अथवा नाना प्रकार से हमारा धारण करनेवाली है, [ग] तथा यह वेदवाणीरूप गौ (सकृत्स्वम्) = एक बार जनती है, पर (पुरुपुत्राम्) = बहुत पुत्रोंवाली है। इस वाक्य में विरोधाभास अलंकार का सुन्दर उदाहरण है। विरोध का परिहार इस प्रकार है कि एक बार ही इसके अध्ययन का अवसर प्राप्त होता है, ब्रह्मचर्याश्रम में इसे पढ़ लिया तो पढ़ लिया। फिर गृहस्थ में फँसे-पढ़ने का अवसर गया। परन्तु यह (पुरु) = पालन व पूरण करनेवाली है [ पृ पालनं- पूरणयोः] शरीर को नीरोग बनानेवाली है, मन की न्यूनताओं को दूर करनेवाली है, साथ ही (पुत्राम्) = [पुनाति त्रायते ] यह हमारे जीवनों को पवित्र करती है और हमारा त्राण- रक्षण करती है। एवं प्रभु का उपासक जितेन्द्रिय बनकर वेदवाणी रूप गौ का दोहन करता है। इस दोहन से वह अपने जीवन को पवित्र बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का उपासक वह है जो इन्द्रिय समूह को मार लेता है, इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश में कर लेता है। यह उपासक वेदवाणी रूप गौ का दोहन करता हुआ अपने जीवन को आप्यायित करता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (ते) तव (आयवः) प्रजाजनाः “आयवः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] (तत्-आ-अभिपनन्त) तदा समन्तात्-अभि-स्तुवन्ति प्रशंसन्ति “पन स्तुतौ” [भ्वादि०] (ये गोमन्तम्-ऊर्वं तितृत्सान्) पृथिवीमन्तं भूमिमन्तं भूमेराच्छादकं धान्यम् “ऊर्वम्-आच्छादकम्” [ऋ० ४।२८।५ दयानन्दः] छेदयितुमिच्छन्ति, एवं ते प्रसन्नतामनुभवन्तः (ये सकृत्स्वं पुरुपुत्राम्) ये हि सकृदेवोत्पादयित्री बहुधान्यादिपुत्रवतीम् (सहस्रधारां बृहतीं महीं दुधुक्षन्) सहस्रजलधारावतीं महतीं महत्त्वपूर्णां पृथिवीं दुहन्ति ततो धान्यफलरसादिकं गृह्णन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, ruler of the world, the people adore and exalt you when they reap the harvest of abundant food and milk, and when they till the land, and, like the mother cow, wish to milk the great wide earth of a thousand streams who, for her many many children, produces all things together.