जितेन्द्रिय बनकर वेदवाणी रूप गौ का दोहन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते आयवः) = वे मनुष्य (तत् आपनन्त) = वह आपका स्तवन करते हैं, (ये) = जो (गोमन्तम्) = इन्द्रियों से बने हुए (ऊर्वम्) = समूह को (तितृत्सान्) = मारने की कामना करते हैं । 'इन्द्रियों को मारना', अर्थात् 'इन्द्रियों को वश में करना' यही वस्तुतः प्रभु का सच्चा पूजन होता है । जितेन्द्रिय पुरुष प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठता है और प्रभु की सच्ची उपासन करनेवाला होता है । [२] ये उपासक वे होते हैं (ये) = जो (महतीम्) = इस अत्यन्त आदर के योग्य वेदवाणी का (दुदुक्षन्) = दोहन करने की कामना करते हैं। यह वेदवाणी [क] (महीम्) = अत्यन्त महनीय है, अर्थ के गौरव से पूर्ण है । [ख] सहस्त्रधाराम् शतशः ज्ञानधाराओं से हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाली है अथवा नाना प्रकार से हमारा धारण करनेवाली है, [ग] तथा यह वेदवाणीरूप गौ (सकृत्स्वम्) = एक बार जनती है, पर (पुरुपुत्राम्) = बहुत पुत्रोंवाली है। इस वाक्य में विरोधाभास अलंकार का सुन्दर उदाहरण है। विरोध का परिहार इस प्रकार है कि एक बार ही इसके अध्ययन का अवसर प्राप्त होता है, ब्रह्मचर्याश्रम में इसे पढ़ लिया तो पढ़ लिया। फिर गृहस्थ में फँसे-पढ़ने का अवसर गया। परन्तु यह (पुरु) = पालन व पूरण करनेवाली है [ पृ पालनं- पूरणयोः] शरीर को नीरोग बनानेवाली है, मन की न्यूनताओं को दूर करनेवाली है, साथ ही (पुत्राम्) = [पुनाति त्रायते ] यह हमारे जीवनों को पवित्र करती है और हमारा त्राण- रक्षण करती है। एवं प्रभु का उपासक जितेन्द्रिय बनकर वेदवाणी रूप गौ का दोहन करता है। इस दोहन से वह अपने जीवन को पवित्र बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का उपासक वह है जो इन्द्रिय समूह को मार लेता है, इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश में कर लेता है। यह उपासक वेदवाणी रूप गौ का दोहन करता हुआ अपने जीवन को आप्यायित करता है ।