पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषां अमृतानाम्) = गत मन्त्र में वर्णित इन अमृत विषय वासनाओं के पीछे न मरनेवाले, देवों की (इयं गीः) = यह वेदवाणी होती है। वे इस वेदवाणी को अपनाते हैं। (ये) = जो देव इस वेदवाणी को अपनाते हैं वे सर्वताता यज्ञों के अन्दर (रत्नम्) = अपने रमणीय धनों को कृपणन्त = [कृपू सामर्थ्ये] शक्तिशाली बनाते हैं । वेदवाणी में दिये गये प्रभु के आदेश के अनुसार वे धनों का यज्ञों में विनियोग करते हैं और इस प्रकार इनके धन और अधिक पुष्ट होते हैं । [२] (ते) = वे देव (धियं च यज्ञं च) = बुद्धियों को तथा यज्ञादि उत्तम कर्मों को (साधन्तः) = सिद्ध करते हुए, अपने जीवन में ज्ञान व उत्तम कर्मों का सम्पादन करते हुए (नः) = हमारे लिये (असामि) = पूर्णरूप से [सामि = आधा] (वसव्यम्) = निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों के समूह को (धान्तु) = धारण करें । वस्तुतः मनुष्य ज्ञानपूर्वक कर्मों में व्यापृत रहता है तो उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ तो ठीक बनी ही रहती हैं, उसके ज्ञान व शक्ति में क्षीणता नहीं आती। इसी को इस रूप में कह सकते हैं कि इसके 'ब्रह्म व क्षत्र' का विकास होकर उसके शोभा की वृद्धि होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देव [क] वेदवाणी को अपनाते हैं, [ख] धनों का यज्ञों में विनियोग करते हैं,[ग] बुद्धि व यज्ञ का साधन करते हैं, [घ] निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों को पूर्णरूप से धारण करनेवाले होते हैं ।