पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषाम्) = गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का धारण करनेवाले इन भक्तों की (इवः) = पुकार, अर्थात् प्रार्थना (असुर:) प्राणशक्ति का संचार करनेवाली है [ असून् राति ] । इस प्रार्थना से ही यह भक्त द्यां नक्षत द्युलोक को प्राप्त करता है, प्रार्थना इसे प्रकाशमय लोक में प्राप्त कराती है। एवं प्रार्थना के दो मुख्य लाभ हैं- [क] प्राणशक्ति का संचार, और [ख] प्रकाश की प्राप्ति । [२] यह भक्त (श्रवस्यता मनसा) = ज्ञान प्राप्ति की कामनावाले मन से (क्षां निंसत) = पृथ्वी का चुम्बन करता है, अर्थात् अत्यन्त नम्र होता है। घमण्डी के लिये ऐसा मुहाविरा प्रयुक्त होता है कि 'न जाने इसका दिमाग कहाँ चढ़ गया है ?' इसके विपरीत नम्रता का सूचन इन शब्दों से हुआ है कि यह पृथ्वी का चुम्बन करता है जितनी नम्रता उतना ही ज्ञान । नम्रता से ही ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञानी अधिकाधिक नम्र होता चलता है। 'सोमवार' सौम्यता के वरण का ही तो उपदेश देता है । यह सौम्यता का वरण ही हमारा 'मंगल' करता है और हमें 'बुध' [= ज्ञानी] बनाता है। 'बुध' ही क्या, ज्ञानियों का भी ज्ञानी 'बृहस्पति' बनाता है । [२] (यत्र) = यह सौम्यता का मार्ग वह है जहाँ (चक्षाणा) = मार्ग को देखते हुए (देवा:) = ज्ञानी लोग (सुविताय) = सदा उत्तम मार्ग के लिये होते हैं । ये देव लोग (स्वैः) = अपने वारेभिः ठीक चुनावों के द्वारा अपने जीवन को (द्यौः न) = प्रकाशमय द्युलोक की तरह (कृणवन्त) = कर लेते हैं। जिस प्रकार लोक सूर्य के प्रकाश से चमकता है, इसी प्रकार इनका जीवन भी ज्ञान के सूर्य से देदीप्यमान हो उठता है, इनके जीवन-गगन में कहीं भी अन्धकार नहीं रहता। 'बृहस्पति' ज्ञानियों के ज्ञानी बनकर ये अत्यन्त शुचि कर्मोंवाले 'शुक्र' बनते हैं। जीवन में शान्तिपूर्वक मार्ग का आक्रमण करते हुए ये 'शनैश्चर' होते हैं और ज्ञान से अज्ञानान्धकार को दूर करते हुए ज्ञान- सूर्यवाले ये लोग अपने जीवन में 'रवि' वार को लानेवाले होते हैं। इनका जीवन देदीप्यमान द्युलोक की तरह बन जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रार्थना हमें शरीर में प्राणशक्ति सम्पन्न व मस्तिष्क में ज्ञान सम्पन्न बनाये । नम्रता से हमारा ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़े। हम सुमार्ग पर चलें और जीवन में ठीक चुनाव करते हुए चमकें ।