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च॒क्रं यद॑स्या॒प्स्वा निष॑त्तमु॒तो तद॑स्मै॒ मध्विच्च॑च्छद्यात् । पृ॒थि॒व्यामति॑षितं॒ यदूध॒: पयो॒ गोष्वद॑धा॒ ओष॑धीषु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

cakraṁ yad asyāpsv ā niṣattam uto tad asmai madhv ic cacchadyāt | pṛthivyām atiṣitaṁ yad ūdhaḥ payo goṣv adadhā oṣadhīṣu ||

पद पाठ

च॒क्रम् । यत् । अ॒स्य॒ । अ॒प्ऽसु । आ । निऽस॑त्तम् । उ॒तो इति॑ । तत् । अ॒स्मै॒ । मधु॑ । इत् । च॒च्छ॒द्या॒त् । पृ॒थि॒व्याम् । अति॑ऽसितम् । यत् । ऊधः॑ । पयः॑ । गोषु॑ । अद॑धाः । ओष॑धीषु ॥ १०.७३.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:73» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य चक्रम्) इस राजा का राष्ट्र (अप्सु-आनिषत्तम्) जलों में-नदीकुल्याओं के मध्य स्थित हो (उत-उ-अस्मै) अपितु इस राष्ट्र  के लिए (तत्-मधु) वहाँ जल (इत्-चच्छद्यात्) अवश्य राष्ट्र में बल देता है (पृथिव्याम्-अतिषितम्) भूमि में उद्घाटित तथा सींचा हुआ (यत्-ऊधः) जो जलबान्ध है, (पयः) वहाँ का जल (गोषु ओषधीषु) खेत की क्यारियों में और वहाँ की ओषधियों में (अदधाः) धारण करे-पहुँचावे ॥९॥
भावार्थभाषाः - राजा का राष्ट्र नदियों नहरों से युक्त हो, इससे राष्ट्र को बल मिलता है। राष्ट्र भूमि में जल को एकत्र तथा बान्ध बनाकर खेतों और ओषधियों में सींचे ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

घर - दूध- अन्न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (अस्य) = गत मन्त्र में वर्णित इस प्रभु-भक्त का अप्सु कर्मों के विषय में (चक्रम्) = नियमित गति से चलनेवाला क्रम, अर्थात् दैनिक कार्यक्रम का चक्र (आ-निषत्तम्) = सम्यक्तया [सद्गति] गतिमय होता है, अर्थात् जब यह प्रभु-भक्त [क] स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों को करके, [ख] अध्यात्म उन्नति के लिये ध्यान व स्वाध्याय को करता है। [ग] इसके बाद संसार यात्रा के लिये जीविका प्राप्ति के लिये किसी उत्तम कर्म में प्रवृत्त होता है, [घ] और अन्त में प्रभु स्मरण के साथ लोकहित के लिये यथाशक्ति कार्य को करता हुआ दिन के कार्यचक्र को पूर्ण करता है (तद्) = तब (उत उ) = अवश्य ही वे प्रभु (अस्मै) = इस कर्त्तव्यचक्र को पूर्ण करनेवाले पुरुष के लिये (मधुरत्) = माधुर्य ही माधुर्य (चच्छद्यात्) = चाहते हैं [छन्द्= wish, desere] प्रभु इसके जीवन को अत्यन्त मधुर बनाते हैं । [२] इसके जीवन को मधुर बनाने के लिये वे [क] (पृथिव्याम्) = पृथिवी पर (यत् अतिषितम्) = जो अत्यन्त सुबद्ध है उस (ऊधः) = शत्रुओं से अप्राप्य सुरक्षित गृह को (अदधाः) = धारण करते हैं [an apartment to wlrich only friends are inkited] । इस छोटे, परन्तु शान्त गृह में वे शान्तिपूर्वक अपने जीवन का यापन करते हैं । [ख] इनके लिये इस घर में वे प्रभु (गोषु पयः) = गौवों में दूध का स्थापन करते हैं । इनके लिये घर में गोदुग्ध सुप्राप होता है । यह दूध इनके शरीर, मन व बुद्धि सभी को स्वस्थ बनाता है । [ग] इस दूध के साथ प्रभु (ओषधीषु) = ओषधियों में 'ओषधयः फलपाकान्ताः ' फलपाक से ही जिनका अन्त हो जाता है उन गेहूँ, जौ, चावल आदि अन्नों में (पयः) = आप्यायन व वर्धन को धारण करते हैं । अर्थात् अन्नादि वानस्पतिक पदार्थ ही इनके आप्यायन का कारण बनते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने दैनिक कार्यक्रम का उत्तमता से पालन करेंगे तो प्रभु हमें सुबद्ध गृह- दूध व अन्न प्राप्त कराके हमारे जीवन को अत्यन्त मधुर बना देंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य चक्रम्) अस्य राज्ञो राष्ट्रम् “चक्रवद्वर्तमानं राज्यम्” [ऋ० ४।३०।४ दयानन्दः] (अप्सु आनिषत्तम्) जलेषु-समन्तात् स्थितं भवतु (उत-उ-अस्मै) अपि तु खल्वस्मै राष्ट्राय (तत्-मधु) तत्रस्थं जलम् “मधु उदकनाम” [निघ० १।१२] (इत्-चच्छद्यात्) अवश्यं राष्ट्रे बलं प्रयच्छति “छदयत् बलयति” [ऋ० ६।४९।५ दयानन्दः] (पृथिव्याम्-अतिषितम्) भूमौ खलूद्घाटितमुत्पादितं (यत्-ऊधः) यज्जलबन्धनम् “ऊधः-जलस्थानम्” [ऋ० १।१४६।२ दयानन्दः] (पयः-गोषु-ओषधीषु-अदधाः) तत्रत्यञ्जलम् “पयः-उदकनाम” [निघ० १।१२] क्षेत्रभक्तिषु तत्रौषधिषु धारय ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - His wheel of power and presence which operates across the spaces and rules the dynamics of nature and humanity also fills and covers the whole system of existence with honey sweets of joy for life and for the lord’s own fulfilment too, the same honey which fertilises the earth and fills the clouds, the nectar that is filled in the cow’s udders and sweetens the sap in the herbs.