पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (अस्य) = गत मन्त्र में वर्णित इस प्रभु-भक्त का अप्सु कर्मों के विषय में (चक्रम्) = नियमित गति से चलनेवाला क्रम, अर्थात् दैनिक कार्यक्रम का चक्र (आ-निषत्तम्) = सम्यक्तया [सद्गति] गतिमय होता है, अर्थात् जब यह प्रभु-भक्त [क] स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों को करके, [ख] अध्यात्म उन्नति के लिये ध्यान व स्वाध्याय को करता है। [ग] इसके बाद संसार यात्रा के लिये जीविका प्राप्ति के लिये किसी उत्तम कर्म में प्रवृत्त होता है, [घ] और अन्त में प्रभु स्मरण के साथ लोकहित के लिये यथाशक्ति कार्य को करता हुआ दिन के कार्यचक्र को पूर्ण करता है (तद्) = तब (उत उ) = अवश्य ही वे प्रभु (अस्मै) = इस कर्त्तव्यचक्र को पूर्ण करनेवाले पुरुष के लिये (मधुरत्) = माधुर्य ही माधुर्य (चच्छद्यात्) = चाहते हैं [छन्द्= wish, desere] प्रभु इसके जीवन को अत्यन्त मधुर बनाते हैं । [२] इसके जीवन को मधुर बनाने के लिये वे [क] (पृथिव्याम्) = पृथिवी पर (यत् अतिषितम्) = जो अत्यन्त सुबद्ध है उस (ऊधः) = शत्रुओं से अप्राप्य सुरक्षित गृह को (अदधाः) = धारण करते हैं [an apartment to wlrich only friends are inkited] । इस छोटे, परन्तु शान्त गृह में वे शान्तिपूर्वक अपने जीवन का यापन करते हैं । [ख] इनके लिये इस घर में वे प्रभु (गोषु पयः) = गौवों में दूध का स्थापन करते हैं । इनके लिये घर में गोदुग्ध सुप्राप होता है । यह दूध इनके शरीर, मन व बुद्धि सभी को स्वस्थ बनाता है । [ग] इस दूध के साथ प्रभु (ओषधीषु) = ओषधियों में 'ओषधयः फलपाकान्ताः ' फलपाक से ही जिनका अन्त हो जाता है उन गेहूँ, जौ, चावल आदि अन्नों में (पयः) = आप्यायन व वर्धन को धारण करते हैं । अर्थात् अन्नादि वानस्पतिक पदार्थ ही इनके आप्यायन का कारण बनते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने दैनिक कार्यक्रम का उत्तमता से पालन करेंगे तो प्रभु हमें सुबद्ध गृह- दूध व अन्न प्राप्त कराके हमारे जीवन को अत्यन्त मधुर बना देंगे।