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त्वमे॒तानि॑ पप्रिषे॒ वि नामेशा॑न इन्द्र दधिषे॒ गभ॑स्तौ । अनु॑ त्वा दे॒वाः शव॑सा मदन्त्यु॒परि॑बुध्नान्व॒निन॑श्चकर्थ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam etāni papriṣe vi nāmeśāna indra dadhiṣe gabhastau | anu tvā devāḥ śavasā madanty uparibudhnān vaninaś cakartha ||

पद पाठ

त्वम् । ए॒तानि॑ । प॒प्रि॒षे॒ । वि । नाम॑ । ईशा॑नः । इ॒न्द्र॒ । द॒धि॒षे॒ । गभ॑स्तौ । अनु॑ । त्वा॒ । दे॒वाः । शव॑सा । म॒द॒न्ति॒ । उ॒परि॑ऽबुध्नान् । व॒निनः॑ । च॒क॒र्थ॒ ॥ १०.७३.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:73» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (त्वम्) तू (एतानि नाम) इन शत्रुओं को नमानेवाले अपने सैन्यबलों को (वि पप्रिषे) विशेषरूप से सुरक्षित रखता है-रख (ईशानः) इनका स्वामी समर्थ होता हुआ (गभस्तौ) अपने हाथ में भी वज्र को (दधिषे) धारण करता है (देवाः) विजय चाहनेवाले विद्वान् (शवसा) अपने बल से वर्तमान (त्वा) मुझे (अनुमदन्ति) हर्षित करते हैं (उपरिबुध्नान्) उत्कृष्ट दृढ़मूलवाले-बलवानों (वनिनः) हिंसकों को (चकर्थ) तू नष्ट करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - राजा शत्रुओं को नमानेवाले अपने सैन्यबलों की रक्षा करे तथा अपने हाथ में भी शस्त्र अस्त्र धारण करता है, तो विजयाकाङ्क्षी विद्वान् भी उसका साथ देते हैं, फिर वह अति-बलवान् शत्रुओं को भी नष्ट करता है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपरि- बुध्न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार तत्त्वद्रष्टा प्रभु सब यज्ञों को प्रभु से होता हुआ समझते हैं, इसीलिए उन्हें उन यज्ञों का गर्व नहीं होता। यह गर्व का न होना ही उन्हें विनीत बनाये रखता है । (एतानि विनामा) = इन विविध नामों का उच्चारण करनेवाले प्रभु-भक्तों को हे (ईशान) = सर्वैश्वर्यवाले (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (पप्रिषे) = पूर्ण बनाते हैं, इनकी न्यूनताओं को आप ही दूर करते हैं। इनकी न्यूनताओं को दूर करने के लिये आप इन्हें (गभस्तौ) = ज्ञान-रश्मियों में (दधिषे) = धारण करते हैं। ज्ञान के प्रकाश में ये मार्ग-भ्रष्ट नहीं होते और मार्ग पर चलते हुए देववृत्ति के बनते हैं, आपके समीप और समीप पहुँचते जाते हैं । [२] (त्वा अनु) = आपकी अनुकूलता में चलते हुए (देवाः) = ये देव पुरुष (शवसा) = शक्ति से (मदन्ति) = हर्ष का अनुभव करते हैं । उपासक उपास्य की शक्ति से शक्ति सम्पन्न बनता है । उपासना का मुख्य लाभ ही यह है कि उस प्रभु की शक्ति को हम अपने में भरनेवाले होते हैं। [३] हे प्रभो! आप (वनिनः) = इन उपासकों को [वन संभक्तौ ] (उपरिबुध्नान्) = ऊपर मूलवाला (चकर्थ) = करते हैं। ये अपने जीवन का मूल व आधार प्रकृति को न बनाकर प्रभु को बनाते हैं । इनकी क्रियाएँ प्राकृतिक भोगों को दृष्टिकोण में न रखकर प्रभु प्राप्ति के दृष्टिकोण से होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु स्मरण करें। प्रभु हमारा पूरण करेंगे, ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करायेंगे। हम प्रभु की शक्ति से शक्ति सम्पन्न होते हुए प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से ही सब क्रियाओं को करेंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (त्वम्) त्वं खलु (एतानि नाम) इमानि शत्रून् नम्रीकुर्वाणानि स्वसैन्यबलानि (वि पप्रिषे) विशिष्टतया पिपर्षि रक्षसि (ईशानः-गभस्तौ दधिषे) समर्थः स्वामी सन् स्वहस्तेऽपि वज्रं धारयसि (देवाः) विद्वांसो विजयकाङ्क्षिणः (शवसा) स्वबलेन वर्तमानम् (त्वा-अनुमदन्ति) त्वामनुहर्षन्ति (उपरिबुध्नान् वनिनः-चकर्थ) उत्कृष्टमूलान् बलवतोऽपि हिंसकान् शत्रून् नाशय ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, you fill up all these agents of positivity with strength. Ruling and controlling, you hold the rule and justice like the thunderbolt in hand. Consequently all the divinities of nature and humanity rejoice and exalt you with power and joy. Indeed you turn all the clouds above downwards to release the showers of life giving