पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार तत्त्वद्रष्टा प्रभु सब यज्ञों को प्रभु से होता हुआ समझते हैं, इसीलिए उन्हें उन यज्ञों का गर्व नहीं होता। यह गर्व का न होना ही उन्हें विनीत बनाये रखता है । (एतानि विनामा) = इन विविध नामों का उच्चारण करनेवाले प्रभु-भक्तों को हे (ईशान) = सर्वैश्वर्यवाले (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (पप्रिषे) = पूर्ण बनाते हैं, इनकी न्यूनताओं को आप ही दूर करते हैं। इनकी न्यूनताओं को दूर करने के लिये आप इन्हें (गभस्तौ) = ज्ञान-रश्मियों में (दधिषे) = धारण करते हैं। ज्ञान के प्रकाश में ये मार्ग-भ्रष्ट नहीं होते और मार्ग पर चलते हुए देववृत्ति के बनते हैं, आपके समीप और समीप पहुँचते जाते हैं । [२] (त्वा अनु) = आपकी अनुकूलता में चलते हुए (देवाः) = ये देव पुरुष (शवसा) = शक्ति से (मदन्ति) = हर्ष का अनुभव करते हैं । उपासक उपास्य की शक्ति से शक्ति सम्पन्न बनता है । उपासना का मुख्य लाभ ही यह है कि उस प्रभु की शक्ति को हम अपने में भरनेवाले होते हैं। [३] हे प्रभो! आप (वनिनः) = इन उपासकों को [वन संभक्तौ ] (उपरिबुध्नान्) = ऊपर मूलवाला (चकर्थ) = करते हैं। ये अपने जीवन का मूल व आधार प्रकृति को न बनाकर प्रभु को बनाते हैं । इनकी क्रियाएँ प्राकृतिक भोगों को दृष्टिकोण में न रखकर प्रभु प्राप्ति के दृष्टिकोण से होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु स्मरण करें। प्रभु हमारा पूरण करेंगे, ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करायेंगे। हम प्रभु की शक्ति से शक्ति सम्पन्न होते हुए प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से ही सब क्रियाओं को करेंगे।