पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (ऋतात्) = हमारे दैनिक कार्यक्रम को ठीक समय पर करने से अथवा यज्ञों से (अधि- मन्दमानः) = खूब प्रसन्न होते हुए, (इषिरेभिः) = निरन्तर गतिशील (सखिभिः) = मरुत् [=प्राण] रूप मित्रों के द्वारा (प्रजायै) = हम प्रजाओं के लिये अर्थम् वाञ्छनीय वस्तुओं को अवपत्-देते हैं । जिस समय हम [क] सब क्रियाओं को ठीक समय व स्थान पर करते हैं, [ख] जब हमारा जीवन यज्ञमय होता है, [ग] जब हम प्राणसाधना करनेवाले होते हैं, तब प्रभु हमें सब वाञ्छनीय वस्तुएँ देते हैं । वस्तुतः वाञ्छनीय वस्तुएँ तीन ही हैं, शरीर का स्वास्थ्य, मन का नैर्मल्य और बुद्धि की तीव्रता। ये तीनों ही इन मरुतों व प्राणों की साधना से प्राप्त होती हैं । [२] (आभिः) = इन प्रजाओं के हेतु से (हि) = ही प्रभु [क] (मायाः) = असुरों की मायाओं पर तथा (दस्युम्) = [दस्=destroy] उपक्षीण करनेवाली इन काम-क्रोधाति दास्यव वृत्तियों पर उप आगत्-आक्रमण करते हैं। जीव के हित के लिये प्रभु इन वृत्तियों को नष्ट करते हैं । [ख] तमांसि अज्ञानान्धकारों को (अवपत्) = नष्ट करते हैं । 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' इस ऋतम्भरा प्रज्ञा के पोषण के होने पर अज्ञानान्धकार का नामोनिशान नहीं रहता। [ग] (तम्रा:) = [तम् = to wish, desire ] वाञ्छनीय (मिहः) = धर्ममेघ समाधि में होनेवाली आनन्द की वृष्टियों को (अवपत्) = करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ऋत के पालन व प्राणायाम के होने पर [क] सब वाञ्छनीय वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, [ख] अन्दर ऋतम्भरा प्रज्ञा का प्रकाश होता है, [ग] समाधिजन्य आनन्द की प्राप्ति होती है ।