पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (प्रजिगासि) = तू प्रकृष्ट गतिवाला होता है, अर्थात् उत्तम मार्ग पर चलता है अथवा प्रभु की ओर चलता है [ प्रकृति की ओर जाना ही नीचे की ओर जाना है, प्रभु की ओर जाना ही उत्कृष्ट मार्ग पर जाना है] तो (ते) = तेरे (पादा) = पाँचों (ऋष्वा) = [great, high, noble] महान् व उत्कृष्ट होते हैं। पाँवों की क्या, (ये चित्) = जो भी (अत्र) = यहां शरीर में (वाजा:) = शक्तियाँ हैं (उत) = और वे भी (अवर्धन्) = वृद्धि को प्राप्त होती हैं । प्रभु की ओर चलने से शक्तियों में वृद्धि होती है, प्रकृति में फँसना ही शक्तियों को जीर्ण करता है। [२] प्रभु की ओर चलता हुआ (इन्द्र) = हे जितेन्द्रिय पुरुष ! (त्वम्) = तू (सहस्त्राम्) = शतश: (सालावृकान्) = [dog, wolf, deer, jaekal cat, monkey] कुत्ते, भेड़िये, हरिण, बिल्ली, गीदड़ व बन्दर आदि की वृत्तियों को (आसन् दधिषे) = जबड़े में धारण करता है, अर्थात् इनको कुचल डालता है। 'उलूकयातुं शुशुलूकयातुं० ' मन्त्र में उलूक आदि की वृत्ति को छोड़ने का उपदेश है। यहाँ 'सालावृक' इस एक शब्द से ही इन सब अशुभ वृत्तियों के त्याग का संकेत हुआ है। कुत्ते की तरह हमें परस्पर वैरी नहीं बनना, भेड़िये की तरह पेटू नहीं बनना, हरिण की तरह श्रवणव्यसनी नहीं होना, बिल्ली की तरह निर्बलों पर अत्याचार में आनन्द नहीं लेना, गीदड़ की तरह छलछिद्रवाला नहीं होना और बन्दर की तरह चञ्चल नहीं बनना । [३] इन वृत्तियों को दूर करने के लिये ही तू (अश्विना) = प्राणापान का (ववृत्याः) = आवर्तन करता है । प्राणायाम के द्वारा तूने इन सब वृत्तियों को दूर करना है। प्राणसाधना से चित्तवृत्ति का निरोध करके तू अपने को इन अशुभ वृत्तियों से बचा सकेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- उत्कृष्ट मार्ग पर चलने से शक्तियों का वर्धन होता है । प्रभु-प्रवण व्यक्ति अशुभवृत्तियों का शिकार नहीं होता। इस कार्य में प्राणसाधना इसके लिये सहायक होती है ।