पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र का माता से प्राप्त कराये गये चरित्रवाला वीर (द्रुहः निषत्ता) = काम, क्रोध, लोभ आदि आन्तरिक जिघांसु शत्रुओं का नाश करनेवाला होता है [सद् = to kill ] । यह (चित्) = निश्चय से (एवैः) = अपनी क्रियाओं के द्वारा (पृशनी) = उस प्रभु से सम्पर्क-पृशनवाला होता है। (ते) = गत मन्त्र में वर्णन किये गये वे मरुत् (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (पुरुशंसेन) = पालनात्मक व पूरणात्मक उपदेश के द्वारा (वावृधुः) = खूब ही बढ़ाते हैं । [ पुरु- पृ पालनपूरणयोः] । [२] (ता) = वे अपत्य [=सन्तान] (इव) = मानो (महापदेन) = उस महान् गन्तव्य प्रभु से [पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृत:] (अभीवृता) = परिवृत से होते हैं। वस्तुतः माता, पिता, आचार्य व अतिथि आदि को निमित्त बनाकर प्रभु ही उनका रक्षण करते हैं। ये व्यक्ति (प्रपित्वात्) = समीप प्राप्त (ध्वान्तात्) = अन्धकार से (उद् अरन्त) = ऊपर उठते हैं, इसलिए ऊपर उठते हैं कि (गर्भाः) = ये माता आदि के गर्भ बनते हैं । ५ वर्ष तक माता की दृष्टि में रहते हुए ये चरित्रवान् बनते हैं । फिर ८ वर्ष तक पितृगर्भ में रहते हुए ये शिष्टाचार की शिक्षा को प्राप्त करते हैं। फिर आचार्य इन्हें गर्भ में करके ज्ञान से परिपूर्ण करता है 'आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः ' । अन्ततः अतिथियों के गर्भ में रहता हुआ गृहस्थ कभी मार्ग भ्रष्ट नहीं होता। अपने जीवन में यह प्रभु के गर्भ में रहने का तो प्रयत्न करता ही है । इसी कारण यह अन्धकार से ऊपर उठ पाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- माता, पिता, आचार्य, अतिथि व महापद [प्रभु] के गर्भ में रहते हुए हम अन्धकार से सदा ऊपर उठें।