पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के तेजस्वी व ज्ञानी पुरुष (वयः) = मार्ग पर चलनेवाले होते हैं, कभी कर्त्तव्यमार्ग से भ्रष्ट नहीं होते (सुपर्णः) = कर्त्तव्यमार्ग पर चलते हुए ये अपना उत्तमता से पालन व पूरण करते हैं। शरीर को रोगों से आक्रान्त नहीं होने देते, साथ ही मन में न्यूनताओं को नहीं आने देते। इस पालन व पूरण के लिये ही ये (इन्द्रं उपसेदुः) = उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का उपासन करते हैं । वस्तुतः प्रभु ने ही तो पालन व पूरण करना होता है । [२] ये व्यक्ति (प्रियमेधाः) = बुद्धि प्रिय होते हैं । इन्हें प्रचिकेता की तरह सांसारिक भोगों की रुचि न होकर ज्ञान प्राप्ति की ही कामना होती है । इस कामना के कारण ही ये (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा बनते हैं । और (नाधमानाः) = सदा प्रभु से प्रार्थना करते हुए होते हैं कि हे प्रभो ! (ध्वान्तम्) = अज्ञानान्धकार को (अप ऊर्णुहि) = हमारे से दूर करिये, (चक्षुः पूर्धि) = प्रकाश का हमारे में पूरण करिये और अज्ञानान्धकार के कारण (निधया इव) = विषयों के जाल समूह से बद्धान् बन्धे हुए हम लोगों को (मुमुग्धि) = मुक्त करिये। ज्ञान के प्रकाश में विषयों का अन्धकार लुप्त हो जाए और हमारा जीवन पवित्र होकर आपकी उपासना के योग्य बने ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मार्ग पर चलते हुए जीवन को सुन्दर बनाएँ। हमारी यही कामना हो कि प्रभु हमारे अज्ञानान्धकार को दूर करके हमारे में प्रकाश का पूरण करें जिससे हम विषयजालबन्धन से सदा मुक्त रहें। सम्पूर्ण सूक्त जीवन को सुन्दर बनाने पर बल देता है। प्रारम्भ में कहा है कि मनुष्य 'उग्र, मन्द्र, ओजिष्ठ व बहुलाभिमान' बने । [१] अशुभवृत्तियों का संहार करे, [३] अभिमानशून्य हो, [७] भौतिक प्रवृत्ति का न होकर अध्यात्मवृत्तिवाला हो, [८] दूध व अन्नरस को ही अपना आहार बनाये, [९] शक्ति व ज्ञान का पुञ्ज बने, [१०] प्रभु से यही आराधना करे कि 'अज्ञानान्धकार को दूर करिये। प्रकाश का हमारे में पूरण करिये। [११] हम शत्रुओं का संहार करनेवाले व ज्ञानैश्वर्य को प्राप्त करनेवाले हों-