पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (उग्रः) = तेजस्वी होकर (सहसे) = आन्तरिक शत्रुओं के पराभव के लिये तथा (तुराय) = बाह्य शत्रुओं के हिंसन के लिये (जनिष्ठाः) = समर्थ होता है । इन शत्रुओं के नाश से (मन्दुः) = अत्यन्त आनन्दमय जीवनवाला, (ओजिष्ठः) = खूब ही ओजस्वी तू होता है । ओजस्वी होने से तू (बहुलाभिमानः) = बहुत आत्मसम्मान की भावनावाला होता है, आत्मसम्मान को खोकर तू संसार में अशुभ कार्यों में प्रवृत्त नहीं होता । यह आत्मसम्मान की भावना ही तुझे खुशामदरूप आत्महनन से बचानेवाली होती है । [२] इस प्रकार के जीवनवाले (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (अत्र) = यहाँ संसार में (मरुतः) = माता, पिता, आचार्य व अतिथि [मितराविणः, महद् द्रवन्ति इति वा नि० ११।१३] रूपेण परिमित बोलनेवाले व खूब क्रियाओं में गतिवाले मनुष्य (अवर्धन्) = सब प्रकार से बढ़ाते हैं । माता इसके चरित्र का निर्माण करती है, पिता इसे शिष्टाचार सिखाते हैं और आचार्य इसे ज्ञान से भरने का प्रयत्न करते हैं । अतिथि इसके लिये मार्गदर्शन कराते हुए इसे मार्ग भ्रष्ट होने से बचाते हैं । [३] यह सब वर्धन होता तभी है (यद्) = जब कि माता-माता (वीरं दधनत्) = इस वीर को धारण करती है, वही (धनिष्ठा) = धारण करनेवालों में सर्वोत्तम है। माता का कार्य तो भवन की नींव के रूप में है, उस नींव पर ही बाकी सब ने इसके जीवन के भवन का निर्माण करना होता है। इसी दृष्टि से माता का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है, माता का आदर सब से अधिक है। माता सन्तान में आत्मसम्मान की भावना को भर के उसे क्षुद्र कार्यों से एकदम पराङ्मुख कर देती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें 'उग्र-मन्द्र-ओजिष्ठ व बहुलाभिमान' बनना है। इस जीवन की नीव माता रखती है और उस नीव पर 'पिता, आचार्य, अतिथि' जीवन भवन का निर्माण करते हैं।