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यस्ति॒त्याज॑ सचि॒विदं॒ सखा॑यं॒ न तस्य॑ वा॒च्यपि॑ भा॒गो अ॑स्ति । यदीं॑ शृ॒णोत्यल॑कं शृणोति न॒हि प्र॒वेद॑ सुकृ॒तस्य॒ पन्था॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yas tityāja sacividaṁ sakhāyaṁ na tasya vācy api bhāgo asti | yad īṁ śṛṇoty alakaṁ śṛṇoti nahi praveda sukṛtasya panthām ||

पद पाठ

यः । ति॒त्याज॑ । स॒चि॒ऽविद॑म् । सखा॑यम् । न । तस्य॑ । वा॒चि । अपि॑ । भा॒गः । अ॒स्ति॒ । यत् । ई॒म् । शृ॒णोति॑ । अल॑कम् । शृ॒णो॒ति॒ । न॒हि । प्र॒ऽवेद॑ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । पन्था॑म् ॥ १०.७१.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:71» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो जन (सचिविदं सखायम्) सहायता देनेवाले साथी मित्ररूप वेद को (तित्याज) त्यागता है (तस्य) उसका (वाचि-अपि) वाणी में-कथन में भी (भागः-न अस्ति) लाभ नहीं होता है (यत्-ईम्-शृणोति) जो वह सुनता है, पढ़ता है (अलकं शृणोति) अलीक-तुच्छ सुनता है, पढ़ता है (सुकृतस्य पन्थाम्) वास्तविक ज्ञान के मार्ग को (नहि प्रवेद) नहीं जानता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - वेद मानव का सच्चा साथी है। वह विपत्ति और सम्पत्ति दोनों को सुझाता है। जो इसे त्याग देता है, उसके कथन में और सुनने में कुछ सार नहीं है। वह मानव जीवन के मार्ग से विचलित रहता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सखा का अत्याग

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (सचिविदं) [सचा विद्यते ] = सदा साथ रहनेवाले अथवा [ शंची विन्दति 'अन्तर्भावितण्यर्थ'] = शक्ति व प्रज्ञान को प्राप्त करानेवाले (सखायम्) = मित्र प्रभु को (तित्याज) = छोड़ देता है, (तस्य) = उसका (वाचि) = वेदवाणी में (भागः अपि) = कुछ भी अंश (न अस्ति) = नहीं होता प्रभु का विस्मरण करनेवाला वेदवाणी को ग्रहण नहीं कर पाता । [२] वेदवाणी को छोड़कर यह संसार में (ईम्) = निश्चय से (यत् शृणोति) = जो अन्य बातें सुनता है अलकं शृणोति वह सब असत्य ही सुनता है । उस सब श्रवण से यह (सुकृतस्व) = पुण्य के (पन्थाम्) = मार्ग को (नहि प्रवेद) = निश्चय से नहीं जान पाता। वेदों को छोड़कर अन्य बातों को सुनते रहना हमारे लिये धर्मज्ञान में सहायक नहीं होता । वेद व वेद के व्याख्यान ग्रन्थ ही हमें धर्म की प्रेरणा देते हैं । अन्य ज्ञान वस्तुतः ज्ञान ही नहीं होता, वह हमें धर्म की ओर झुकाववाला नहीं करता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्मरण से शक्ति व प्रज्ञा में वृद्धि होती है, हम वेद को समझने योग्य बनते हैं और धर्म का ज्ञान प्राप्त करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः सचिविदं सखायं तित्याज) यो जनः सहायतां प्रापयितारं “षच समवाये” [भ्वादि०] ततः इन् औणादिकः सखिभूतं वेदं त्यजति (तस्य वाचि-अपि भागः-न-अस्ति) तस्य कथनेऽपि कथनलाभो न भवति (यत्-ईम् शृणोति-अलकं शृणोति) यत्खलु शृणोति पठति सो अलीकं तुच्छं शृणोति “ईकारस्थानेऽकारश्छान्दसः” (सुकृतस्य पन्थां नहि प्रवेद) वास्तविकस्य लाभस्य पन्थानं न प्रवेत्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - If someone forsakes the divine speech of the Veda, a real intimate friend for life and after, there remains no substance even in his speech of daily wear, and whoever listens to him listens in vain because he does not know the path of well being and of well doing.