सप्तरेभा वेदवाणी का ऋषियों में प्रवेश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यज्ञेन) = यज्ञ के द्वारा उस उपास्य प्रभु के द्वारा ['यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः '] (वाचः) = वाणी के (पदवीयम्) = मार्ग को (आयन्) = प्राप्त हुए । सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु के द्वारा अग्नि आदि को इस वेदवाणी का ज्ञान हुआ और (ऋषिषु प्रविष्टाम्) = अग्नि आदि ऋषियों के हृदयों में प्रविष्ट हुई- हुई (ताम्) = उस वेदवाणी को (अन्वविन्दन्) = पीछे अन्य ऋषियों ने प्राप्त किया। प्रभु ने अग्नि आदि को ज्ञान दिया। अग्नि आदि से अन्य ऋषियों ने इसे पाया । [२] (तां आमृत्या) = उस वेदवाणी को उत्तमता से धारण करके उन्होंने (पुरुत्रा) = बहुत स्थानों में (व्यदधुः) = इसे स्थापित किया। इसका मनुओं में, विचारशील पुरुषों में प्रचार किया, (ताम्) = उस वेदवाणी को (सप्त रेभाः) = सात गायत्री आदि छन्द (अभिसंनवन्ते) = प्राप्त होते हैं। यह वेदवाणी गायत्री आदि सात छन्दों में प्रवृत्त होती है । अथवा 'सप्तरेभाः' को समस्त पद लेकर यह अर्थ किया जा सकता है कि उस वेदवाणी को 'कानों, नासिकाओं, आँखों व मुख' से इन सातों से प्रभु-स्तवन करनेवाले लोग (अभितः) = प्राप्त होते हैं
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु अग्नि आदि को वेदज्ञान देते हैं, इनसे अन्य यज्ञिय वृत्तिवाले ऋषियों को यह प्राप्त होती है। उसे ये ऋषि मानवसमाज में प्रचरित करते हैं। यह वेदवाणी सात छन्दों से युक्त है, अथवा 'कान - २, नाक-२, आँख-२, मुख -१' ये सात स्तोता बनकर इसे प्राप्त करते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना- प्रारम्भिक चरण का अर्थ यह भी है कि 'यज्ञ से, श्रेष्ठतम कर्मों से वाणी के मार्गको प्राप्त करते हैं'। यज्ञिय वृत्ति हृदय का शोधन करके हमें वेदज्ञान के मार्ग का पथिक बना देती है ।