पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जैसे (सक्तुम्) = सत्तु को (तितउना) = छाननी से (पुनन्तः) = पवित्र करते हैं, उसी प्रकार (यत्र) = जहाँ (धीराः) = ज्ञान में रमण करनेवाले धीर पुरुष (मनसा) = मन से, मन में मनन व चिन्तन के द्वारा, (वाचम्) = इस वेदवाणी को (अक्रत) = प्रकृति प्रत्यय के विचार से प्रकटार्थ करते हैं (अत्रा) = यहाँ (सखायः) = [सह ख्यानं येषां ] मिलकर ज्ञान की चर्चा करनेवाले ये लोग (सख्यानि) = वास्तविक मित्रता को (जानते) = अनुभव करते हैं । इस संसार में वास्तविक मैत्री तो प्रभु के ही साथ है, मैत्री का अनुभव ये ज्ञान की चर्चा करनेवाले ही कर पाते हैं । [२] (एषां वाचि) = इनकी वाणी में (भद्रा लक्ष्मीः) = कल्याणी लक्ष्मी (अधि निहिता) = आधिक्येन निहित होती है । इनकी वाणी पवित्र उस होती है, ये सब के लिये शुभ ही शब्दों को बोलती है, सदा प्रभु के नाम का स्मरण करने से यह लक्ष्मी सम्पन्न बनी रहती है। जब लक्ष्मीवान् वे प्रभु हैं, इनकी वाणी में लक्ष्मी क्यों न हो ! वास्तव में तो इनकी वाणी में ऐसी शक्ति आ जाती है कि ये जो कुछ बोलते हैं वैसा ही हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वेदवाणी की मिलकर चर्चा करने से वाणी में भद्रा लक्ष्मी का निवास होता है।