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बृह॑स्पते प्रथ॒मं वा॒चो अग्रं॒ यत्प्रैर॑त नाम॒धेयं॒ दधा॑नाः । यदे॑षां॒ श्रेष्ठं॒ यद॑रि॒प्रमासी॑त्प्रे॒णा तदे॑षां॒ निहि॑तं॒ गुहा॒विः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhaspate prathamaṁ vāco agraṁ yat prairata nāmadheyaṁ dadhānāḥ | yad eṣāṁ śreṣṭhaṁ yad aripram āsīt preṇā tad eṣāṁ nihitaṁ guhāviḥ ||

पद पाठ

बृह॑स्पते । प्र॒थ॒मम् । वा॒चः । अग्र॑म् । यत् । प्र । ऐर॑त । ना॒म॒ऽधेय॑म् । दधा॑नाः । यत् । ए॒षा॒म् । श्रेष्ठ॑म् । यत् । अ॒रि॒प्रम् । आसी॑त् । प्रे॒णा । तत् । ए॒षा॒म् । निऽहि॑तम् । गुहा॑ । आ॒विः ॥ १०.७१.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:71» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में वेदों का प्रकाश तथा प्रचार करना, उसके अर्थज्ञान से लौकिक इष्टसिद्धि, अध्यात्म सुखलाभ, सब ज्ञानों से महत्ता, आदि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पते) हे वेदवाणी के स्वामी परमात्मन् ! (वाचः-अग्रं प्रथमम्) वाणी के श्रेष्ठरूप सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाले (नामधेयं यत्-दधानाः प्रैरत) पदार्थमात्र के नामव्यवहार के प्रदर्शक वेद को धारण करते हुए परमर्षि प्रेरित करते हैं, जनाते हैं (यत्) यतः (एषाम्) इन परम ऋषियों का (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ कार्य (अरिप्रम्-आसीत्) पापरहित-निष्पाप है (प्रेणा-एषां गुहा निहितम्) तेरी प्रेरणा से इन परमर्षियों के हृदय में प्रकट होता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - वेद का स्वामी परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में आदि ऋषियों के पवित्र अन्तःकरण में वेद का प्रकाश करता है, जो पदार्थमात्र के गुण स्वरूप को बताता है, उसे वे ऋषि दूसरों को जनाते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सृष्टि के प्रारम्भ में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बृहस्पते) [बृहस्पतेः] = उस ज्ञान के स्वामी प्रभु का (प्रथमम्) = [प्रथ विस्तारे] अत्यन्त विस्तारवाला (वाचः अग्रम्) = वाणी के अग्र स्थान में होनेवाला यह वेदज्ञान है। 'प्रथमं' तो इसलिए कि इसमें सब सत्यविद्याओं का प्रकाश हुआ है और 'वाचः अग्रं' इसलिए कि सबसे पूर्व इन्हीं शब्दों का उच्चारण हुआ 'तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्' प्रभु ने मानस पुत्रों को जन्म दिया और उनमें से श्रेष्ठतम चार जो 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' उनके हृदयों में इस वेदज्ञान का प्रकाश किया। इस प्रकार सबसे प्रथम इसी वाणी का उच्चारण हुआ। [२] [क] अब (नामधेयं दधानाः) = प्रभु के नाम का हृदयों में धारण करते हुए अन्य ऋषियों व विचारशील व्यक्तियों ने भी (यत्) = यह जो वेदज्ञान था उसे (प्रैरत) = अपने में प्रेरित किया। अग्नि आदि से इन्होंने वेदज्ञान को प्राप्त किया और इस वेदज्ञान को प्राप्त करते हुए ये सदा उस प्रभु के नाम का मानस जप करने में व्यस्त रहे । [ख] इस मन्त्रभाग का अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है कि संसार में भिन्न-भिन्न संस्थाओं [ आकृतियों] का नाम रखते समय इन्होंने उस वेदवाणी को ही अपने में प्रेरित किया, उसका ध्यान करके उसी में से नदियों के सिन्धु आदि पर्वतों के हिमालयादि नाम रखे 'वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे'। [३] (एषाम्) = सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए हुए इन व्यक्तियों में (यत्) = जो (श्रेष्ठम्) = सर्वोत्तम थे (यत्) = जो (अरिशम्) = बिलकुल निर्दोष थे, जिनकी बुद्धि व मन सर्वाधिक पवित्र (आसीत्) = थे (तत्) = सो (एषाम्) = इनके श्रेष्ठ व अरिप्र लोगों के (गुहा) = हृदय रूप गुहा में (प्रेणा) = [प्रेम्णा ] प्रभु प्रेम के कारण (निहितम्) = यह वेदज्ञान स्थापित हुआ और (आविः) = प्रकट हुआ। प्रारम्भिक मानसी सृष्टि में जो सर्वाग्रणी थे उनके पवित्रतम हृदयों में यह वेदज्ञान प्रकट किया गया। इनके द्वारा यह वेदज्ञान औरों तक पहुँचा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु से दी गई वेदवाणी ही इस सृष्टि के प्रारम्भिक शब्द थे । सर्वश्रेष्ठ हृदयों में इसका प्रकाश हुआ और उनके द्वारा इसका विस्तार हुआ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते वेदानां प्रकाशस्तत्प्रचारश्च, तदर्थज्ञानेन लौकिकेष्टसिद्धिरध्यात्मलाभश्च प्राप्यते तस्य सर्वज्ञानेभ्यो महत्त्वञ्चेत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पते) वेदवाचः स्वामिन् ! परमात्मन् ! (वाचः-अग्रं प्रथमं नामधेयं यत्-दधानाः-ऐरत) वाण्याः-श्रेष्ठरूपं प्रथमं सृष्टेरारम्भे पदार्थजातस्य नामव्यवहारप्रदर्शकं वेदं धारयन्तः परमर्षयः प्रेरयन्ति प्रज्ञापयन्ति (यत्) यतः (एषाम्) परमर्षीणां (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठं कार्यं (अरिप्रम्-आसीत्) पापरहितं निष्पापम् “रपो रिप्रमिति पापनामनी भवतः” [निरु० ४।२१] आसीत् (प्रेणा-एषां गुहा-निहितम्) तव-प्रेरणया, एषां परमर्षीणां गुहायां हृदये स्थितं (आविः) तदाविर्भवति प्रकटीभवति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of Infinite Speech, Brhaspati, the first and original form of eternal speech, which is the integration of name, word and factual reality, which the sages receive and bear in mind and articulate at the dawn of human creation, lies immanent in the universal mind. It is borne in the best and immaculate minds of the sages who make it manifest from there by divine inspiration in a state of grace.