प्रभु अंगिरसों के मित्र हैं
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देव) = दिव्यगुणों के पुञ्ज ! (त्वष्टः) = [ त्विषेर्वा स्याद्दीप्तिकर्मणः, त्वक्षतेर्वा गतिकर्मणः नि०] दीप्त व सारे संसार के निर्माता प्रभो ! (यद् ह) = जो निश्चय से आप (चारुत्वम्) = सौन्दर्य को (आनट्) = व्याप्त करते हैं, अर्थात् सम्पूर्ण सौन्दर्य के स्वामी हैं तथा (यद्) = जो आप (अंगिरसाम्) = अंग- प्रत्यंग में रसवाले, अर्थात् सबल शरीरवालों के (सचाभूः अभवः) = साथ होनेवाले हैं । (स) = वे आप (प्रविद्वान्) = हमारी स्थिति के प्रकर्षेण जानते हुए (उशन्) = हमारे हित को चाहते हुए (देवानाम्) = देवों के (पाथः) = सात्त्विक अन्न को [food] (उपयक्षि) = हमारे साथ संगत करिये। देवों से खाने योग्य सात्त्विक अन्न के प्रयोग से ही हमारी वृत्ति भी देववृत्ति बनेगी। सब जीवन का सौन्दर्य इस सात्त्विक अन्न पर ही निर्भर करता है। इसी अन्न ने हमें अंग-प्रत्यंग में रसवाला सात्त्विक शक्ति सम्पन्न बनाना है। [२] हे प्रभो! आप ही (द्रविणोदः) = सब द्रविणों के देनेवाले हैं और (सुरत्न:) = सुन्दर रमणीय रत्नोंवाले हैं। आपका मित्र बनकर मैं इन द्रविणों व रत्नों को क्यों न प्राप्त करूँगा ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की मित्रता में ही जीवन का सौन्दर्य है । देवताओं का सात्त्विक अन्न ही हमें सात्त्विक बनाकर सशक्त बनायेगा और हम प्रभु की मित्रता के अधिकारी होंगे।