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देव॑ त्वष्ट॒र्यद्ध॑ चारु॒त्वमान॒ड्यदङ्गि॑रसा॒मभ॑वः सचा॒भूः । स दे॒वानां॒ पाथ॒ उप॒ प्र वि॒द्वाँ उ॒शन्य॑क्षि द्रविणोदः सु॒रत्न॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

deva tvaṣṭar yad dha cārutvam ānaḍ yad aṅgirasām abhavaḥ sacābhūḥ | sa devānām pātha upa pra vidvām̐ uśan yakṣi draviṇodaḥ suratnaḥ ||

पद पाठ

देव॑ । त्व॒ष्टः॒ । यत् । ह॒ । चा॒रु॒ऽत्वम् । आन॑ट् । यत् । अङ्गि॑रसाम् । अभ॑वः । स॒चा॒ऽभूः । सः । दे॒वाना॑म् । पाथः॑ । उप॑ । प्र । वि॒द्वान् । उ॒शन् । य॒क्षि॒ । द्र॒वि॒णः॒ऽदः॒ । सु॒ऽरत्नः॑ ॥ १०.७०.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:70» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वष्टः-देव) हे जगत् के रचनेवाले परमात्मदेव ! (यत्-ह चारुत्वम्-आनट्) जो तू कल्याणरूपता या श्रेष्ठता प्राप्त किये हुए है (यत्-अङ्गिरसां सचाभूः-अभवः) और जो तुझ परमात्मा को अपना अङ्गी बनाकर रस लेते हैं, उन विद्वानों का सहयोगी होता है-हो (सः) वह तू (द्रविणोदः) हे धन प्रदान करनेवाले (सुरत्नः) सुरमणीय भोगवाला होता हुआ (देवानां पाथः) उन विद्वानों के पथ्य भोग को (विद्वान्-उशन्) जानता हुआ, देने की कामना करता हुआ (उप प्रयक्षि) देता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा जगत् का रचयिता जीवों के ऊपर अपनी दयारूप श्रेष्ठता को प्रकट करता है। जो उपासक तुझे अपना अङ्गी बनाकर आनन्द रस लेते हैं, उन्हें तू निश्चय अपना उपहार देता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु अंगिरसों के मित्र हैं

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देव) = दिव्यगुणों के पुञ्ज ! (त्वष्टः) = [ त्विषेर्वा स्याद्दीप्तिकर्मणः, त्वक्षतेर्वा गतिकर्मणः नि०] दीप्त व सारे संसार के निर्माता प्रभो ! (यद् ह) = जो निश्चय से आप (चारुत्वम्) = सौन्दर्य को (आनट्) = व्याप्त करते हैं, अर्थात् सम्पूर्ण सौन्दर्य के स्वामी हैं तथा (यद्) = जो आप (अंगिरसाम्) = अंग- प्रत्यंग में रसवाले, अर्थात् सबल शरीरवालों के (सचाभूः अभवः) = साथ होनेवाले हैं । (स) = वे आप (प्रविद्वान्) = हमारी स्थिति के प्रकर्षेण जानते हुए (उशन्) = हमारे हित को चाहते हुए (देवानाम्) = देवों के (पाथः) = सात्त्विक अन्न को [food] (उपयक्षि) = हमारे साथ संगत करिये। देवों से खाने योग्य सात्त्विक अन्न के प्रयोग से ही हमारी वृत्ति भी देववृत्ति बनेगी। सब जीवन का सौन्दर्य इस सात्त्विक अन्न पर ही निर्भर करता है। इसी अन्न ने हमें अंग-प्रत्यंग में रसवाला सात्त्विक शक्ति सम्पन्न बनाना है। [२] हे प्रभो! आप ही (द्रविणोदः) = सब द्रविणों के देनेवाले हैं और (सुरत्न:) = सुन्दर रमणीय रत्नोंवाले हैं। आपका मित्र बनकर मैं इन द्रविणों व रत्नों को क्यों न प्राप्त करूँगा ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की मित्रता में ही जीवन का सौन्दर्य है । देवताओं का सात्त्विक अन्न ही हमें सात्त्विक बनाकर सशक्त बनायेगा और हम प्रभु की मित्रता के अधिकारी होंगे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वष्टः-देव) हे जगद्रचयित देव परमात्मन् ! (यत्-ह चारुत्वम्-आनट्) यत् खलु कल्याणरूपत्वं श्रेष्ठत्वं प्राप्नोषि (यत्-अङ्गिरसां सचाभूः-अभवः) यच्च अङ्गिनं त्वां परमात्मानं स्वस्मिन् रसयन्ति तेषां विदुषाम् “अङ्गिरसो विद्वांसः” [ऋ० ३।३१।१९] सहयोगी भवसि (सः) स त्वं (द्रविणोदः) हे धनदः ! (सुरत्नः) सुरमणीयभोगवान् सन् (देवानां पाथः) तेषां विदुषां पथ्यं भोगं (विद्वान्-उशन्) जानन् तथा च दातुं कामयमाना सन् (उप प्र यक्षि) उपप्रयच्छसि ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divine Tvashta, creator and maker of the forms of existence, when you create the beauty and graces of life and become a friend and associate of the Angirasas, spirit and energy of the life of humanity, then O generous lord of the world’s wealth, loving and all knowing, pray give food and living sustenance for the holy creative people on their paths of life.