पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार सब इन्द्रियों के ठीक होने पर (उषासानक्ता) = ये दिन और रात (देवी) = हमारे सब व्यवहारों के साधक हों [दिव्= व्यवहार] इनमें हमारा दैनिक कार्यक्रम बड़ी सुन्दरता से चले। किसी कर्म के करने में हम प्रमाद न करें। (दिवः दुहितरा) = ये ज्ञान प्रकाश का प्रपूरण करनेवाले हों, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों से अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करनेवाले हों । तथा (सुशिल्पे) = उत्तम शिल्पवाले हों। इन दिन व रात में प्रत्येक कार्य बड़े कलापूर्ण तरीके से किया जाये । कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य को सुन्दरता से करनेवाली हों। [२] इस प्रकार के ये दिन-रात, जिनमें ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान के पूरण में लगी हैं और कर्मेन्द्रियाँ कलापूर्ण तरीके से कार्यों में व्यापृत हैं, (योनौ) = उस मूल-स्थान प्रभु में (निसदताम्) = निश्चय से स्थित हों । अर्थात् दिन-रात प्रभु का स्मरण चले। हमारा प्रत्येक कार्य प्रभु स्मरण पूर्वक हो । [३] हे उषासानक्ता ! (उशती) = आप हमारे हित की कामनावाले हो। और (उशन्तः) = हमारे हित को चाहते हुए (देवासः) = सब देव (वाम्) = आपकी (उरौ) = विशाल व (सुभगे) = उत्तम ऐश्वर्यवाली उपस्थे गोद में (आसीदन्तु) = आसीन हों। दिन-रात्रि की गोद के उरु व सुभग होने का भाव यह है कि हमारा हृदय सदा विशाल व श्री सम्पन्न बना रहे। उस विशाल श्री-सम्पन्न हृदय में सब दिव्यभावनाओं का निवास हो । पूर्वार्ध में कहा था कि हम सदा प्रभु का स्मरण करनेवाले बनें, उत्तरार्ध में कहते हैं कि हमारे हृदयों में दिव्यगुणों का विकास हो । प्रभु स्मरण से दिव्यगुणों की उत्पत्ति होती है। प्रभु स्मरण कारण है, दिव्यगुणों का विकास उसका कार्य ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम दिन-रात प्रभु स्मरण करते हुए, प्रभु स्मरणपूर्वक सब कार्यों को करते हुए, अपने जीवन में दिव्यता का अवतरण करें।