पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'अष्टचक्रा नवद्वारा०' आदि मन्त्रभागों में द्वार् शब्द इन्द्रियों के लिये प्रयुक्त हुआ है। इन इन्द्रियों के दो मुख्य विभाग हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ । ज्ञानेन्द्रियों के लिये प्रार्थना करते हैं कि हे ज्ञानेन्द्रियरूप द्वारो! (दिवः) = ज्ञान के (वरीयः) = विशाल व उत्कृष्ट (सानु) = शिखर को (स्पृशता) = तुम छूनेवाले बनो। अर्थात् ऊँचे से ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करनेवाले होओ। हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्ति का साधन बनें। [२] (वा) = और हे कर्मेन्द्रिय रूप द्वारो ! तुम (पृथिव्याः मात्रया) = पृथिवी की मात्रा से, अर्थात् पृथिवी को इकाई बनाकर, सारी पृथिवी को ही अपना कुटुम्ब समझकर, (वि श्रयध्वम्) = विशेषरूप से लोकहितात्मक कर्मों का सेवन करनेवाले बनो । अर्थात् तुम्हारे सब कार्य हृदय की विशाल वृत्ति से किये जाएँ, स्वार्थ से ऊपर उठकर ही सब कार्य हों। [३] (उशती:) = हित की कामनावाले (द्वार:) = इन्द्रिय द्वारो ! (महिना महद्भिः) = महिमा से महान् देवों से अधिष्ठित और अतएव (देवं रथम्) = इस प्रकाशमय रथ को (रथयुः) = रथ की कामनावाले होकर (धारयध्वम्) = धारण करो। इस शरीर-रथ में सब देव आरुढ़ हैं, 'सर्वाह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते'। सूर्य यहाँ आँखों में स्थित है, तो दिशाएँ कानों में, वायु नासिका में, अग्नि मुख में, चन्द्रमा मन में, पृथिवी पाँवों में और इसी प्रकार अन्यान्य देवता अन्यान्य स्थानों में स्थित हैं। सब देवों का अधिष्ठान होने से यह शरीर - रथ 'देवरथ' है । इस देवरथ को ये सब इन्द्रिय द्वार उत्तमता से धारण करते हैं। सब इन्द्रिय द्वारों [ख] का उत्तम होना [सु] ही 'सुख' है। इनकी विकृति [दुः] ही 'दुःख' है । शरीर के ये सब द्वार ठीक होंगे तभी ज्ञान के शिखर पर भी हम पहुँचेंगे और तभी व्यापक लोकहित के कार्यों को कर सकेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमारे सब इन्द्रिय द्वार ठीक हों । ज्ञानेन्द्रियाँ हमें ज्ञानशिखर पर पहुँचाएँ और कर्मेन्द्रियाँ व्यापक यज्ञात्मक कर्मों में व्यापृत रहें ।