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वि प्र॑थतां दे॒वजु॑ष्टं तिर॒श्चा दी॒र्घं द्रा॒घ्मा सु॑र॒भि भू॑त्व॒स्मे । अहे॑ळता॒ मन॑सा देव बर्हि॒रिन्द्र॑ज्येष्ठाँ उश॒तो य॑क्षि दे॒वान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi prathatāṁ devajuṣṭaṁ tiraścā dīrghaṁ drāghmā surabhi bhūtv asme | aheḻatā manasā deva barhir indrajyeṣṭhām̐ uśato yakṣi devān ||

पद पाठ

वि । प्र॒थ॒ता॒म् । दे॒वऽजु॑ष्टम् । ति॒र॒श्चा । दी॒र्घम् । द्रा॒घ्मा । सु॒र॒भि । भू॒तु॒ । अ॒स्मे इति॑ । अहे॑ळत । मन॑सा । दे॒व॒ । ब॒र्हिः॒ । इन्द्र॑ऽज्येष्ठान् । उ॒श॒तः । य॒क्षि॒ । दे॒वान् ॥ १०.७०.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:70» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:21» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवजुष्टं बर्हिः) जीवन्मुक्तों के द्वारा सेवित करने योग्य प्रवृद्ध विज्ञान (विप्रथताम्) विस्तृत होवे-होता है (अस्मे) हमारे लिए (तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सूरभि भूतु) अन्दर रखा हुआ बड़ा और चिरस्थायी सुगन्धरूप होवे, होता है (देव) हे परमात्मदेव ! (अहेळता मनसा) क्रोधरहित दयापूर्ण मन से-अपने ज्ञान से (इन्द्रज्येष्ठान्-उशतः-देवान्) इन्द्र अर्थात् तुझ परमात्मा को ज्येष्ठ अर्थात् अपने से ऊपर जो स्वीकार करते हैं, उनको और तुझे चाहनेवाले विद्वानों को (यक्षि) सङ्गति का अवसर दे-अपने साथ मिला ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का ज्ञान जीवन्मुक्तों के अन्दर वृद्धि को प्राप्त होता है। वे लोग अपने ऊपर परमात्मा को ही उपास्य समझते हैं। परमात्मा उन्हें अपनी संगति का लाभ देता है, उनके द्वारा अन्य जन परमात्मा के ज्ञान का लाभ लेते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुरभि जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जब हम हृदयों में देवों को आसीन करते हैं तो यह (देवजुष्टम्) = देवों से, दिव्य भावनाओं से सेवित हृदय (तिरश्चा) = [तिरः अञ्चति] तिरोहितरूपेण रहकर सब गति करते हुए उस प्रभु से (विप्रथताम्) = विशिष्ट विस्तारवाला हो । जब हृदय में प्रभु का हम स्मरण करते हैं तो हृदय विशाल बनता ही है, 'हम सब उस एक प्रभु के पुत्र हैं' यह भावना हमें एक दूसरे के समीप लानेवाली होती है। [२] इस प्रकार हृदय के विशाल बनने पर (दीर्घं द्राघ्मा) = यह लम्बा जीवन का विस्तार (अस्मे) = हमारे लिये (सुरभि भूतु) = सुगन्धित हो। हम कभी इस जीवन में अपशब्दों को न बोलें । वस्तुतः अपशब्दों के प्रयोग का अभाव स्वयं दीर्घायुष्य का कारण बनता है 'सुरभि नो मुखा करत् प्रण आयूंषि तारिषत्' । [३] इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले सुमित्र से प्रभु कहते हैं कि हे (देव) = दिव्यगुणों के अधिष्ठानभूत हृदयवाले! तू (अहेडता मनसा) = किसी से भी घृणा न करते हुए हृदय से (इन्द्रज्येष्ठान्) = सर्वशक्तिमान् प्रभु जिनमें ज्येष्ठ हैं उन (उशतः) = हित की कामनावाले (देवान्) = सब देवों को (बर्हिः) = अपने वासनाशून्य हृदय में यक्षि-संगत कर । हम हृदय से घृणा व द्वेष को दूर करें, तभी यह हृदय 'बर्हिः ' कहलायेगा, जिसमें से वासनाओं का उद्धर्हण कर दिया गया है। इस मन में ही सब देवों के साथ परमदेव प्रभु अधिष्ठित होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा हृदय प्रभु स्मरण से विशाल बने । जीवन सुगन्धित हों तथा प्रभु व देवों को हम हृदय में आसीन करें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवजुष्टं बर्हिः) जीवन्मुक्तैः सेवितव्यं प्रवृद्धं विज्ञानम् “भूमा वै बर्हिः” [श० १।५।४।४] “बर्हिः-विज्ञानम्” [ऋ० १।८३।६ दयानन्दः] (विप्रथताम्) विस्तृतं भवतु (अस्मे) अस्मभ्यं (तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सुरभि भूतु) तिरश्चीनमन्तर्गतम् “तिरोऽन्तर्धौ” [अष्टा० १।४।७०] महत्-चिरस्थायि सुगन्धरूपं भवतु (देव) हे परमात्मदेव ! (अहेळता मनसा) क्रोधरहितेन दयापूर्णेन मनसेव स्वज्ञानेन (इन्द्रज्येष्ठान्-उशतः-देवान्) इन्द्रं त्वां परमात्मानं ज्येष्ठं स्वोपरि वर्तमानं ये मन्यन्ते तान्, त्वां ये कामयन्ते तान् “वश कान्तौ” [अदादिः] विदुषः (यक्षि) सङ्गमयसि ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the yajnic light, fire and prosperity loved by the divinities, grow, expand and rise all round, long, wide and lofty in space and time so that there may be sweet fragrance for us all time. O divine light, fire and fragrance of yajna, O lord of space and divine bliss, help us with a gracious mind free from hate and anger to join the brilliant divinities with Indra, omnipotent Supreme, first and highest of them.