पदार्थान्वयभाषाः - [१] (हविष्मन्तः) = प्रशस्त हविवाले, सदा दानपूर्वक अदन करनेवाले, यज्ञ शेष का सेवन करनेवाले, (मनुष्यासः) = विचारपूर्वक कर्मों को करनेवाले मनुष्य [मत्वा कर्माणि सीव्यति] (शश्वत्तमम्) = उस सनातन (अग्निम्) = अग्रेणी प्रभु को (दूत्याय) = दूत कर्म के लिये, उससे ज्ञान सन्देश को प्राप्त करने के लिये, (ईडते) = उपासित करते हैं । प्रभु के उपासना 'हविष्मान् मनुष्य' बनने से ही होती है, 'कस्मै देवाय हविषा विधेम ' -उस आनन्दमय देव का हवि के द्वारा उपासन करें। [२] वे उपासित प्रभु हमें ज्ञान का सन्देश प्राप्त कराते हुए कहते हैं कि [क] (वहिष्ठैः) = अधिक से अधिक कर्त्तव्यों का वहन करनेवाले (अश्वैः) - इन्द्रियाश्वों से तथा (सुवृता रथेन) = जिसमें प्रत्येक अंग शोभन है 'शोभनं वर्तते 'उस शरीररूप रथ से तू (देवान् आवक्षि) = देवों को अपने में प्राप्त करानेवाला हो। तेरे हृदय में दिव्य भावों का निवास हो, ऐसा होने के लिये तू सदा कर्त्तव्य कर्मों में लगा रह तथा शरीर को स्वस्थ, सुन्दर व सबल बनाने का ध्यान कर । [ख] (इह) = इस जीवन में (होता) = होता बनकर (निषद) = आसीन हो । दानभाव तेरे में सदा बने रहे। देकर ही यज्ञशेष को खानेवाला बन ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जब हम प्रभु का उपासन करते हैं तो प्रभु हमें यही ज्ञान का सन्देश देते हैं कि इन्द्रियों को कर्त्तव्य-कर्मों में व्याप्त रखो और संसार में होता बनकर चलो, यज्ञशेष का ही सेवन करो ।